लाहौर । बुधवार, 27 मई 2026
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की सरकार ने एक बड़ा सांस्कृतिक कदम उठाते हुए लाहौर की ऐतिहासिक पहचान को वापस लाने की योजना बनाई थी। इस योजना के तहत लाहौर की उन सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नामों को बहाल किया जाना था, जिन्हें 1947 में भारत-पाक विभाजन (Pre-Partition Era) के बाद बदल दिया गया था। इन पुराने नामों में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख काल के नाम शामिल थे।
हालांकि, सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध और कट्टरपंथी समूहों के दबाव के बाद सरकार को इस फैसले को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालना पड़ा है। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन (रिटायर्ड) मोहम्मद अली एजाज के मुताबिक, इस मामले पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
नवाज शरीफ और मरियम नवाज का विजन: यूरोप से सीख
इस प्रोजेक्ट की नींव 16 मार्च को ‘लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल’ (LHAR) की एक उच्च स्तरीय बैठक में रखी गई थी, जिसकी अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की थी। मई में मुख्यमंत्री मरियम नवाज की कैबिनेट ने भी इस ‘लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल’ (LAHR) प्रोजेक्ट को अपनी हरी झंडी दे दी थी।
बैठक के दौरान नवाज शरीफ ने तर्क दिया था कि पाकिस्तान को यूरोप के देशों से सीखना चाहिए, जो अपनी ऐतिहासिक विरासतों और पुरानी सड़कों के नामों से कभी छेड़छाड़ नहीं करते। वहीं, मरियम नवाज का भी मानना था कि लाहौर का इतिहास और इसकी पुरानी इमारतें ही इस शहर की असली पहचान हैं, जिसे संजोकर रखना बेहद जरूरी है।
कट्टरपंथियों ने कैसे दिया धार्मिक रंग?
जैसे ही कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह खबर सार्वजनिक हुई, पाकिस्तान के सोशल मीडिया व्लॉगर्स और कट्टरपंथी संगठनों ने मरियम नवाज सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। विरोधियों ने इसे “हिंदू और सिख पहचान को वापस लाने की साजिश” करार दिया और मामले को पूरी तरह से धार्मिक रंग दे दिया।
विपक्षी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के सूत्रों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार को अंदेशा था कि यदि इस फैसले को जबरन लागू किया गया, तो प्रांत में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक असंतोष पैदा हो सकता है। आगामी विवादों और कानून-व्यवस्था की स्थिति को भांपते हुए प्रशासन ने बैकफुट पर आना ही बेहतर समझा।
इतिहासकारों और विशेषज्ञों का क्या है कहना?
कट्टरपंथियों के विरोध के बीच सरकार ने शहर के जाने-माने इतिहासकारों, आर्किटेक्ट्स और अर्बन प्लानर्स (शहरी योजनाकारों) की एक विशेष बैठक बुलाई। इस बैठक में विशेषज्ञों ने साफ तौर पर सरकार के इस कदम का समर्थन किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान एक बहुमूल्य विरासत है और इसे मजहबी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। मशहूर इतिहासकार याकूब खान बंगश के अनुसार, विभाजन के बाद कराची जैसे शहरों में तो बड़ा वैचारिक और जनसांख्यिकीय बदलाव आया, लेकिन लाहौर की स्थिति अलग थी। लाहौर में आने वाले अधिकांश शरणार्थी कामकाजी वर्ग के थे, जिन्होंने शहर के पुराने ताने-बाने और इतिहास को सहर्ष अपना लिया। यही कारण है कि आज भी लाहौर के आम नागरिकों की बोलचाल और यादों में ये पुराने हिंदू-सिख और ब्रिटिश कालीन नाम जिंदा हैं।
नवीनतम स्थिति
सोशल मीडिया पर चल रही कुछ अफवाहों में दावा किया गया था कि सरकार ने इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह से “रद्द” कर दिया है। लेकिन नवीनतम प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार, यह दावा गलत है। सरकार ने इस फैसले को ‘स्थगित’ (Postponed) किया है न कि रद्द। प्रशासन अब इस संवेदनशील मुद्दे पर आम सहमति बनाने और कट्टरपंथी ताकतों को शांत करने के लिए बीच का रास्ता तलाश रहा है।
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