लखनऊ । मंगलवार, 2 जून, 2026
उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद द्वारा लगातार की जा रही कोशिशों और जनहित प्रस्ताव के बाद, उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। आयोग ने प्रथम दृष्टया (शुरुआती जांच में) माना है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) द्वारा जून 2026 के बिजली बिलों में थोपा गया 10 प्रतिशत ईंधन अधिभार (Fuel Surcharge) पूरी तरह से नियामकीय व्यवस्था और नियमों के खिलाफ है।
इस फैसले के बाद अब पावर कॉरपोरेशन के पास इस फैसले को वापस लेने या संशोधित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उपभोक्ताओं की ओर से अब इस मामले में कॉरपोरेशन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की भी मांग उठ रही है।
बिजली बिल में बढ़ोतरी के बजाय 2% की कमी होनी चाहिए थी: उपभोक्ता परिषद
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह से मुलाकात कर इस धोखाधड़ी के खिलाफ एक विस्तृत जनहित प्रत्यावेदन सौंपा था। परिषद ने पुख्ता आंकड़ों के साथ जो खुलासे किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:
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पुराने बकाये को जबरन जोड़ा: नियमों के मुताबिक, फ्यूल एंड पावर परचेज कॉस्ट एडजस्टमेंट (FPPCA) की गणना में केवल चालू अवधि की लागत जोड़ी जानी चाहिए। लेकिन UPPCL ने चालाकी दिखाते हुए मार्च 2026 की लागत के साथ ₹1,400 करोड़ रुपये की पुरानी ऐतिहासिक देनदारियों और एनटीपीसी (NTPC) के पुराने बकाया दावों को भी जोड़ दिया।
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लागत का झूठा आंकड़ा: आयोग द्वारा स्वीकृत बिजली खरीद लागत वास्तव में ₹4.94 प्रति यूनिट थी, लेकिन कॉरपोरेशन ने इसे ₹5.86 प्रति यूनिट दिखाकर राज्य के उपभोक्ताओं पर सीधे ₹1,610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल दिया।
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होना चाहिए था फायदा: उपभोक्ता परिषद का दावा है कि अगर UPPCL नियमों के तहत सही वित्तीय गणना करता, तो जून 2026 में उपभोक्ताओं के बिल में 10% की बढ़ोतरी होने के बजाय लगभग 2 प्रतिशत की कमी होनी चाहिए थी।
नियामक आयोग (UPERC) की कड़ी टिप्पणी और कारण बताओ नोटिस
मामले की गंभीरता को देखते हुए नियामक आयोग ने UPPCL के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। आयोग ने स्पष्ट किया कि पिछली अवधियों के बकाये और पुरानी कानूनी देनदारियों को सीधे चालू FPPCA की गणना में जोड़ना UPERC MYT विनियम-2025 के रेगुलेशन 16.1 का सीधा उल्लंघन है। ऐसा करने से आयोग को उन पुरानी लागतों की सत्यता और वैधता की जांच करने का मौका ही नहीं मिलता, जो उपभोक्ता संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।
7 दिनों के भीतर माँगा स्पष्टीकरण: आयोग ने UPPCL को अल्टीमेटम देते हुए ठीक 7 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत गणना पेश करने का आदेश दिया है। कॉरपोरेशन को यह बताना होगा कि किस कानूनी आधार पर उन्होंने पुरानी देनदारियों को इस गणना में शामिल किया।
फरवरी 2026 में भी हुई थी ऐसी ही वसूली
यह पहली बार नहीं है जब उपभोक्ताओं की जेब पर इस तरह डाका डालने की कोशिश हुई हो। इससे पहले फरवरी 2026 में भी UPPCL ने इसी तरह 10 प्रतिशत का फ्यूल सरचार्ज वसूला था। उस मामले में भी आयोग पहले ही कॉरपोरेशन से स्पष्टीकरण मांग चुका है और वह फाइल अभी खुली हुई है। ऐसे में जून 2026 में दोबारा वही गलती दोहराना बिजली कंपनियों की मनमानी को दर्शाता है।
उपभोक्ता परिषद ने आयोग के सामने मुख्य रूप से चार मांगें रखी हैं:
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जून 2026 से लागू 10% अतिरिक्त वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
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फ्यूल सरचार्ज में जोड़े गए पुराने दावों की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए।
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इतनी महंगी बिजली खरीदने के असली कारणों की समीक्षा की जाए।
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बिजली कंपनियों के पास उपलब्ध अतिरिक्त अधिशेष धनराशि (Surplus) को उपभोक्ताओं के बिलों में एडजस्ट करके राहत दी जाए।
इस बड़े घटनाक्रम से साफ है कि यूपी के 3 करोड़ 73 लाख बिजली उपभोक्ताओं को जल्द ही अपने बिलों में बड़ी कटौतियों के रूप में राहत की सौगात मिल सकती है।
Matribhumisamachar


