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मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: इस्लाम अपनाने पर नहीं मिलेगा ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ आरक्षण; तमिलनाडु सरकार का आदेश रद्द

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चेन्नई । शुक्रवार, 26 जून 2026

मद्रास हाई कोर्ट ने आरक्षण और धर्म परिवर्तन (Religious Conversion) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने तमिलनाडु सरकार के उस विवादास्पद शासनादेश (Government Order – G.O.) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसके तहत इस्लाम धर्म अपनाने वाले पिछड़े और अनुसूचित जाति के लोगों को ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BCM – Backward Class Muslim) श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ देने की बात कही गई थी।

हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने इस नीति को पूरी तरह से असंवैधानिक और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ घोषित किया है।

क्या था तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश?

तमिलनाडु की तत्कालीन सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक शासनादेश [G.O. (Ms) No. 31] जारी किया था। तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश पर आधारित इस आदेश में कहा गया था कि:

  • यदि कोई व्यक्ति पिछड़े वर्ग (BC), अति पिछड़े वर्ग (MBC), गैर-अधिसूचित समुदाय (DNC) या अनुसूचित जाति (SC) से संबंध रखता है और वह इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो भी उसे ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BCM) मानकर आरक्षण का लाभ दिया जाता रहेगा।

  • सरकार ने स्थानीय प्रशासन (Tahsildar) को यह भी अनुमति दी थी कि वे ऐसे धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को राज्य के 7 विशेष अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का ‘कम्युनिटी सर्टिफिकेट’ (जाति प्रमाण पत्र) जारी कर सकते हैं।

इस आदेश के पीछे सरकार का तर्क था कि जो लोग धर्म परिवर्तन से पहले से ही आरक्षण का लाभ ले रहे थे, उनका यह अधिकार धर्म बदलने के बाद भी सुरक्षित रहना चाहिए।

‘वह सिर्फ एक मुस्लिम है, किसी जाति का सदस्य नहीं’ — हाई कोर्ट

जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने इस मामले की गहन कानूनी और वैचारिक समीक्षा की। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“हमारा मानना है कि इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BCM) का दर्जा नहीं मांग सकता। वह सिर्फ एक मुस्लिम है और बस यही बात है।”

अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है, तो जमात या धार्मिक संस्था उसे मुस्लिम बनने का प्रमाण पत्र जारी करती है, न कि किसी विशिष्ट उप-जाति का।

हाई कोर्ट के फैसले के 3 सबसे बड़े कानूनी आधार:

  1. समुदाय जन्म से तय होता है, परिवर्तन से नहीं: अदालत ने कहा कि तमिलनाडु में आरक्षण के पात्र 7 मुस्लिम समुदाय (जैसे लब्बाई, राउथर, मरकयार, दक्कनी आदि) जन्म-आधारित सामाजिक श्रेणियां हैं। कोई भी बाहरी व्यक्ति धर्म बदलकर इन जन्म-आधारित समुदायों का हिस्सा नहीं बन सकता। “यह सोचना ही हास्यास्पद है कि धर्म बदलते ही कोई व्यक्ति राउथर या लब्बाई मुस्लिम बन जाएगा।”

  2. न्यायिक फैसलों को नहीं बदल सकता कार्यपालिका का आदेश: पीठ ने याद दिलाया कि 1951 के ऐतिहासिक ‘जी. माइकल बनाम एस. वेंकटेश्वरन’ मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल ‘एक मुसलमान’ बनता है, किसी खास जाति का सदस्य नहीं। कार्यपालिका (정부) एक सामान्य आदेश जारी करके अदालत के इस स्थापित फैसले को पलट नहीं सकती।

  3. समानता के इस्लामी सिद्धांतों के विपरीत: कोर्ट ने पवित्र कुरान और पैगंबर मोहम्मद के आखिरी उपदेशों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि इस्लाम एक समतावादी (Egalitarian) समाज की स्थापना करता है जहां ईश्वर की नजर में सब बराबर हैं। ऐसे में धर्म परिवर्तन करने वालों को जबरन किसी सामाजिक पदानुक्रम या उप-जाति में बांटना ‘गैर-इस्लामी’ और मनमाना है।

तमिलनाडु में BCM आरक्षण के पात्र 7 समुदाय कौन से हैं?

तमिलनाडु सरकार ने जुलाई 2008 में एक अलग BCM (पिछड़ा वर्ग मुस्लिम) श्रेणी बनाई थी, जिसके तहत केवल निम्नलिखित 7 विशिष्ट समुदायों को ही सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का पात्र माना गया है:

  1. अंसार (Ansar)

  2. दक्कनी मुस्लिम (Dekkani Muslims)

  3. दुबेकुला (Dubekula)

  4. लब्बाई (Labbais – जिसमें राउथर और मरकयार शामिल हैं)

  5. मपिल्ला (Mapilla)

  6. शेख (Sheik)

  7. सैयद (Syed)

अदालत ने साफ किया कि उपर्युक्त जातियों में जन्म लेने वाले लोग ही इस कोटे के हकदार हैं, न कि नए धर्मांतरित लोग। यह मामला समीर अहमद नाम के एक व्यक्ति की याचिका के बाद सामने आया था, जो जन्म से हिंदू थे लेकिन 2015 में इस्लाम अपनाने के बाद ‘मुस्लिम लब्बाई’ का सर्टिफिकेट मांग रहे थे। तहसीलदार द्वारा उनका आवेदन खारिज किए जाने के बाद उन्होंने कोर्ट का रुख किया था।

फैसले का दूरगामी प्रभाव

मद्रास हाई कोर्ट का यह निर्णय देश में आरक्षण नीतियों और धर्म परिवर्तन के अंतर्संबंधों को लेकर एक बड़ी नजीर पेश करता है। यह साफ करता है कि देश का संविधान नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म चुनने का अधिकार (अनुच्छेद 25) तो देता है, लेकिन धर्म बदलने के बाद किसी नई धार्मिक श्रेणी के भीतर मिलने वाले जातिगत आरक्षण का लाभ स्वतः या अवैध प्रमाण पत्रों के जरिए नहीं लिया जा सकता।

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