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आईआईटी दिल्ली में “हिन्दुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस संघ शताब्दी वर्ष

नई दिल्ली. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिन्दू एकेडमिशियन (WAHA) के तत्वाधान में “हिन्दुत्व की शाश्वत प्रासंगिकता” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से 300 से अधिक प्रोफेसरों एवं शिक्षाविदों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए WAHA के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. नचिकेत तिवारी ने कहा कि हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। हिन्दुत्व का मूल अधिष्ठान ज्ञान है, जिसमें वेद, बौद्ध दर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, संत परंपरा और विविध भाषाओं का समावेश है। हिन्दुत्व की मूल पहचान ही ज्ञान है।

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष प्रो. के. के. अग्रवाल ने कहा कि यदि भारत को विश्वगुरु बनना है, तो उसे हिन्दुत्व के सिद्धांतों के अनुरूप आगे बढ़ना होगा। भारत में शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, राष्ट्र की शिक्षा नीति श्रीराम के सिद्धांतों से प्रेरित होनी चाहिए।

संगोष्ठी का प्रथम सत्र “सामाजिक समरसता: हिन्दू जीवन शैली का सार” विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाना ने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए बंधुत्व और एकात्मता की भावना आवश्यक है, जिसके लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने निरंतर संघर्ष किया। हिन्दुत्व के मूल में सामाजिक एकत्व निहित है, जो भारतीय राष्ट्रीय एकता के लिए अनिवार्य है। के. जी. सुरेश ने कहा कि सामाजिक समरसता एक सतत प्रक्रिया है और भारत इस दिशा में सही मार्ग पर अग्रसर है। उन्होंने शिक्षा पद्धति में मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।

संगोष्ठी में दस गुरु परंपरा के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि यह परंपरा न होती, तो उत्तर-पश्चिम भारत विशेषकर पंजाब की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति अत्यंत जटिल हो सकती थी। भारत की संस्कृति और धर्म की अक्षुण्णता हजारों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है, जिसे हिन्दुत्व के सिद्धांतों ने संरक्षित किया।

दूसरा सत्र “पंजाब: संस्कृति, चुनौतियाँ और परिवर्तन” विषय पर आयोजित हुआ। सत्र में डॉ. अशमिंदर सिंह बहल ने कहा कि पंजाब में युवाओं में नशे की समस्या बढ़ रही है, जिसका एक कारण पड़ोसी देश से जुड़ी परिस्थितियाँ भी हैं। युवाओं का निरंतर पलायन और धर्मांतरण जैसी चुनौतियाँ पंजाब की संस्कृति को प्रभावित कर रही हैं, जिनके समाधान हेतु सरकार को त्वरित और ठोस निर्णय लेने होंगे।

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने कहा कि पंजाब की समस्याओं पर निर्भीकता से विचार करना होगा। उन्होंने गुरु नानक देव, गुरु रविदास और गुरु परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘एक ओंकार’ के मंत्र में निहित निर्भयता पंजाब की सांस्कृतिक शक्ति है।

राजनीतिक स्वार्थों के कारण पंजाब में विद्वेष फैलाया गया, जबकि यह भूमि संस्कृति, धर्म और भारतीय परंपरा से एक रही है। उन्होंने बताया कि बजरंग दल पंजाब में नशा मुक्ति हेतु निरंतर कार्य कर रहा है।

संगोष्ठी का तृतीय सत्र “हिन्दू मूल्य: सामाजिक परिवर्तन की दिशा” विषय पर केंद्रित रहा, जिसमें इग्नू की कुलपति प्रो. उमा कांजीलाल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गुरु शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता, भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर विचार प्रस्तुत किए और भारतीय मूल्यों की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। भारत के भविष्य एवं सामाजिक परिवर्तन के लिए मानवीय मूल्य को लेकर चलने की बात कही।

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और शिक्षाविदों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

साभार : विश्व संवाद केंद्र

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