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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल बाद हरीश राणा को मिली ‘गरिमापूर्ण विदाई’

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

नई दिल्ली | 24 मार्च, 2026

भारत के न्यायिक इतिहास में 11 मार्च 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है। पिछले 13 वर्षों से ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे 32 वर्षीय हरीश राणा को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गरिमापूर्ण विदाई मिल गई है। एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञों की देखरेख में उनके जीवन रक्षक तंत्र को हटाने की प्रक्रिया पूरी की गई।

⚖️ क्या था सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख?

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में न केवल राहत दी, बल्कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) की परिभाषा को भी विस्तार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • मेडिकल ट्रीटमेंट बनाम बेसिक केयर: कोर्ट ने माना कि ‘आर्टिफिशियल न्यूट्रिशन और हाइड्रेशन’ (फीडिंग ट्यूब) कोई सामान्य सेवा नहीं, बल्कि एक ‘मेडिकल ट्रीटमेंट’ है। यदि यह मरीज को लाभ पहुँचाने के बजाय उसकी पीड़ा बढ़ा रहा है, तो इसे हटाया जा सकता है।

  • शब्दावली में बदलाव: कोर्ट ने सुझाव दिया कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के बजाय अब ‘विथड्रॉल ऑफ लाइफ सस्टेनिंग ट्रीटमेंट’ (जीवन रक्षक उपचार वापस लेना) शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए।

“यह फैसला समर्पण नहीं, बल्कि असीम करुणा और साहस का प्रतीक है। आप अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ रहे, बल्कि उसे गरिमा के साथ जाने की अनुमति दे रहे हैं।” — जस्टिस जे.बी. पारदीवाला (हरीश के माता-पिता से)

? 2013 से 2026: एक परिवार का संघर्ष

हरीश राणा की कहानी साल 2013 में चंडीगढ़ के एक पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के साथ शुरू हुई थी। गंभीर दिमागी चोट ने उन्हें एक ऐसी दुनिया में धकेल दिया जहाँ वे न देख सकते थे, न सुन सकते थे और न ही महसूस कर सकते थे। उनके माता-पिता ने एक दशक से ज्यादा समय तक उनकी सेवा की, यहाँ तक कि इलाज के लिए अपना घर तक बेच दिया।

? कानूनी मील का पत्थर: कैसे अलग है यह फैसला?

यह मामला ‘कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018)’ के फैसले के बाद पहला ऐसा व्यावहारिक उदाहरण है जहाँ कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप कर प्रक्रिया को सरल बनाया।

  1. 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि खत्म: कोर्ट ने इस विशेष मामले में 30 दिनों की ‘पुनर्विचार अवधि’ को हटा दिया क्योंकि मेडिकल बोर्ड और परिवार दोनों एकमत थे।

  2. पेलिएटिव केयर (Palliative Care): कोर्ट ने निर्देश दिया कि हरीश को एम्स के पेलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया जाए ताकि ट्यूब हटाने के बाद उन्हें किसी भी प्रकार का दर्द या कष्ट न हो।

? आगे की राह: क्या बदलेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य में उन हजारों मरीजों के परिवारों को राहत मिलेगी जो बिना किसी सुधार की उम्मीद के मशीनों पर जीवित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संवेदनशील विषय पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सिफारिश की है ताकि परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।