तेहरान | 04 अप्रैल, 2026
अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य संकट को टालने की पाकिस्तान की कोशिशें अंतिम सांसें गिनती नजर आ रही हैं। ताज़ा कूटनीतिक घटनाक्रमों के अनुसार, ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तरह की सीधी बातचीत करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। इस इनकार ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, जो मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे भीषण युद्ध के बीच शांति की राह देख रही थीं।
पाकिस्तान की मध्यस्थता क्यों हुई फेल?
सूत्रों के अनुसार, तेहरान ने मध्यस्थों को सूचित किया है कि वह अपने शीर्ष प्रतिनिधियों को इस्लामाबाद भेजने के लिए तैयार नहीं है। इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
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सुरक्षा और अविश्वास: ईरान को अंदेशा है कि पाकिस्तान की धरती पर उसके नेताओं को अमेरिकी खुफिया एजेंसियां निशाना बना सकती हैं। जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वली नस्र के अनुसार, “ईरान को ट्रंप प्रशासन पर रत्ती भर भरोसा नहीं है।”
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नेतृत्व परिवर्तन का दबाव: मार्च 2026 में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मृत्यु और मुजतबा खामेनेई के नए सर्वोच्च नेता बनने के बाद, ईरान अपनी छवि को लेकर अधिक रक्षात्मक और सख्त हो गया है।
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कड़ी शर्तें: वॉशिंगटन द्वारा रखी गई ‘एकतरफा’ शर्तों को ईरान ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप की ‘पाषाण युग’ वाली चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस गतिरोध पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा:
“ईरान का नेतृत्व सीजफायर तो चाहता है, लेकिन वे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंधक बनाए रखना चाहते हैं। यदि इसे तुरंत ‘खुला और सुरक्षित’ नहीं किया गया, तो अमेरिका ईरान को ‘पाषाण युग’ (Stone Ages) में वापस भेजने में संकोच नहीं करेगा।”
ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे 6 अप्रैल तक की समयसीमा के बाद किसी भी वक्त ईरान के बुनियादी ढांचे पर बड़े हमले के आदेश दे सकते हैं।
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होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की दुखती रग
मौजूदा तनाव का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य है, जहां से दुनिया का 20% कच्चा तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिससे वैश्विक तेल कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ट्रंप का तर्क है कि अगर ईरान तेल मार्ग नहीं खोलता, तो अमेरिका सैन्य बल का उपयोग कर उसे अपने नियंत्रण में ले लेगा।
तुर्की और मिस्र: अब आखिरी उम्मीद
पाकिस्तान के पीछे हटने के बाद अब तुर्की (इस्तांबुल) और मिस्र (काहिरा) सक्रिय हो गए हैं।
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नए वेन्यू की तलाश: कतर (दोहा) और इस्तांबुल को नए वार्ता केंद्रों के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
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शटल डिप्लोमेसी: तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान और मिस्र के अधिकारी दोनों देशों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभा रहे हैं।
अनिश्चितता के बादल
जहां एक ओर अमेरिका सैन्य कार्रवाई की तैयारी में है, वहीं ईरान अपनी नई लीडरशिप के तहत झुकने को तैयार नहीं दिख रहा। पाकिस्तान की विफलता ने यह साबित कर दिया है कि यह संकट केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तुर्की और मिस्र का ‘प्लान-बी’ युद्ध को टाल पाएगा या खाड़ी क्षेत्र एक और बड़े महाविनाश की ओर बढ़ेगा।
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