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चीन ने हासिल की बड़ी उपलब्धि: अब लैब में तैयार हुई ‘मछली’, स्वाद और पोषण में असली जैसी

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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हांग्जो. खाद्य सुरक्षा और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए चीन के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। चीनी शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला (Lab) के भीतर कृत्रिम मछली का मांस तैयार करने में कामयाबी पाई है। यह मछली बिना किसी समुद्र या तालाब के, केवल कुछ कोशिकाओं (Cells) की मदद से तैयार की गई है।

कैसे तैयार हुई लैब वाली मछली?

जेजियांग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस प्रोजेक्ट पर काम किया। उन्होंने ‘टिश्यू इंजीनियरिंग’ तकनीक का उपयोग करके मछली की मांसपेशियों की कोशिकाओं को लैब में विकसित किया।

  • कोशिका संवर्धन: सबसे पहले मछली के मांस से स्टेम कोशिकाएं ली गईं।

  • 3D प्रिंटिंग का उपयोग: इन कोशिकाओं को एक विशेष ‘बायो-इंक’ के साथ मिलाकर 3D प्रिंटर के जरिए मछली के टुकड़े (Fillets) का आकार दिया गया।

  • विकास: इन टुकड़ों को एक नियंत्रित वातावरण में रखा गया जहाँ कोशिकाओं ने बढ़ना और आपस में जुड़ना शुरू किया, जिससे बिल्कुल प्राकृतिक मांस जैसा टेक्सचर तैयार हो गया।

स्वाद और सेहत में कैसी है यह मछली?

वैज्ञानिकों का दावा है कि यह मछली न केवल देखने में, बल्कि खाने में भी प्राकृतिक मछली जैसी ही है।

  • पोषक तत्व: इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन की उतनी ही मात्रा है जितनी एक असली मछली में होती है।

  • शुद्धता: क्योंकि यह लैब में बनी है, इसलिए इसमें समुद्र में पाए जाने वाले माइक्रोप्लास्टिक, मरकरी (पारा) या अन्य हानिकारक रसायन होने का कोई खतरा नहीं है।

यह खोज क्यों है महत्वपूर्ण?

  1. पर्यावरण संरक्षण: इससे समुद्रों पर मछली पकड़ने का दबाव कम होगा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) सुरक्षित रहेगा।

  2. खाद्य सुरक्षा: बढ़ती आबादी के लिए प्रोटीन की कमी को पूरा करने में यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

  3. पशु क्रूरता का अंत: इस प्रक्रिया में किसी भी जीव की हत्या करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

चुनौतियां और भविष्य

हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में इसे बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जा सकेगा। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी चुनौती इसकी लागत (Cost) है, जिसे कम करने की कोशिशें जारी हैं ताकि यह आम लोगों की थाली तक पहुँच सके।

लैब में तैयार मछली (Cell-based fish) और पारंपरिक रूप से पकड़ी गई मछली के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। यहाँ इन दोनों के मुख्य पहलुओं की तुलना दी गई है:

लैब मछली बनाम प्राकृतिक मछली: एक तुलनात्मक विश्लेषण

विशेषतालैब में तैयार मछली (Lab-grown)पारंपरिक मछली (Wild-caught)
स्रोतबायो-रिएक्टर में विकसित कोशिकाएं।समुद्र, नदियाँ या फिश फार्म।
प्रदूषणसूक्ष्म प्लास्टिक और पारे (Mercury) से मुक्त।प्रदूषण के कारण भारी धातुओं और प्लास्टिक का खतरा।
पर्यावरण पर प्रभावबहुत कम; समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहता है।अधिक; अत्यधिक मछली पकड़ने से प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।
एंटीबायोटिक्सउपयोग की आवश्यकता नहीं होती।फिश फार्मिंग में बीमारियों से बचाने के लिए अक्सर उपयोग होता है।
लागत (Cost)वर्तमान में बहुत अधिक (शोध के चरण में)।तुलनात्मक रूप से सस्ती और सुलभ।
नैतिकता‘क्रूरता मुक्त’ (किसी जीव की हत्या नहीं)।मछली पकड़ने की प्रक्रिया में जीवों को मारना शामिल है।
उपलब्धतासीमित (अभी बाजार में व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं)।वैश्विक बाजारों में हर जगह उपलब्ध।

प्रमुख लाभ और चुनौतियां

मुख्य लाभ: लैब मछली भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए एक ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है, विशेष रूप से उन देशों के लिए जिनके पास समुद्री तट नहीं हैं। यह पूरी तरह से हाइजीनिक और कस्टमाइज़ेबल है (जैसे कि इसमें फैट की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है)।

बड़ी चुनौती: सबसे बड़ी बाधा ‘स्केलेबिलिटी’ है। एक किलो मांस बनाने में अभी बहुत समय और पैसा खर्च होता है। साथ ही, उपभोक्ताओं के बीच इसके प्रति विश्वास जगाना कि यह पूरी तरह सुरक्षित है, एक मुश्किल काम होगा।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।