नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियों को अपनी जांच पूरी करने के लिए एक निश्चित समयसीमा निर्धारित करना केवल एक ‘अपवाद’ (Exception) होना चाहिए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस तरह के निर्देश तभी दिए जाने चाहिए जब जांच में बहुत अधिक और अनुचित देरी हो रही हो।
जांच की स्वतंत्रता और न्यायिक हस्तक्षेप
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि अदालतों को सामान्य परिस्थितियों में जांच की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि:
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अपवाद की स्थिति: समयसीमा तभी तय की जा सकती है जब रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि जांच जानबूझकर लंबी खींची जा रही है या उसमें लापरवाही बरती जा रही है।
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प्रक्रियात्मक निष्पक्षता: जांच एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें साक्ष्य जुटाने और गवाहों के बयान दर्ज करने में समय लगता है। ऐसे में हर मामले में समयसीमा थोपना जांच की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
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निचली अदालतों को संदेश: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट या ट्रायल कोर्ट को प्रत्येक मामले में जांच पूरी करने के लिए कठोर समय सीमा तय करने का नियम नहीं बनाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह टिप्पणी तब आई जब अदालत एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जहां निचली अदालत ने एक निश्चित अवधि के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश में सुधार करते हुए कहा कि जांच की गति और उसका तरीका जांच एजेंसी का विवेकाधिकार है, जब तक कि वह कानून के दायरे में और निष्पक्ष हो।
कानूनी आधार और महत्वपूर्ण अदालती फैसले
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मुख्य रूप से अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और CRPC/BNSS की धाराओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
संवैधानिक और कानूनी प्रावधान
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अनुच्छेद 21: भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) का अधिकार देता है। इसी के आधार पर अक्सर आरोपी जांच में देरी होने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं।
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धारा 173(1) CRPC (अब BNSS की संबंधित धारा): यह स्पष्ट करती है कि प्रत्येक जांच बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरी की जानी चाहिए। हालांकि, कानून में जांच पूरी करने के लिए कोई फिक्स्ड डेडलाइन (जैसे 30 या 60 दिन) नहीं दी गई है, सिवाय बलात्कार जैसे कुछ विशेष अपराधों के।
महत्वपूर्ण न्यायिक मिसालें (Case Laws)
| मामला | कोर्ट का मुख्य फैसला |
| हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य | इसे ‘त्वरित न्याय’ के अधिकार पर मील का पत्थर माना जाता है। कोर्ट ने कहा था कि जांच और सुनवाई में देरी न्याय का गला घोंटने जैसा है। |
| अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर.एस. नायक | इसमें कोर्ट ने माना कि जांच में देरी के आधार पर FIR को रद्द किया जा सकता है, लेकिन यह केवल ‘दुर्लभतम’ मामलों में होना चाहिए। |
| शरद चंद्र साहू बनाम उड़ीसा राज्य | इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस की जांच के अधिकार में कोर्ट को तब तक दखल नहीं देना चाहिए जब तक कि जांच दुर्भावनापूर्ण (Malafide) न हो। |
कोर्ट ‘समयसीमा’ तय करने से क्यों बचता है?
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसले में ‘अपवाद’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि:
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जांच की प्रकृति: कुछ मामलों में फॉरेंसिक रिपोर्ट (FSL), साइबर डेटा, या विदेशों से जानकारी (Letter Rogatory) मंगवानी पड़ती है, जिसमें समय लगना स्वाभाविक है।
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गुणवत्ता से समझौता: यदि कोर्ट सख्त समयसीमा (जैसे 3 महीने) तय कर देता है, तो पुलिस जल्दबाजी में कमजोर चार्जशीट पेश कर सकती है, जिससे अपराधी के छूटने की संभावना बढ़ जाती है।
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शक्ति का पृथक्करण: जांच करना कार्यपालिका (Executive) का काम है। न्यायपालिका इसमें तभी हस्तक्षेप करती है जब उसे लगे कि सत्ता का दुरुपयोग हो रहा है।
‘अत्यधिक देरी’ की परिभाषा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ‘अत्यधिक देरी’ तब मानी जाती है जब:
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आरोपी जेल में हो और पुलिस चार्जशीट दाखिल न कर रही हो (ताकि उसे ‘डिफ़ॉल्ट बेल’ न मिले)।
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जांच एजेंसी बिना किसी ठोस कारण के महीनों तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे।
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जांच का उपयोग केवल व्यक्ति को परेशान करने के लिए किया जा रहा हो।
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