नई दिल्ली | बुधवार, 06 मई, 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह संसद को यह निर्देश नहीं दे सकता कि उसे कानून कैसे बनाना चाहिए। यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई जिसमें 2023 के नए कानून को चुनौती दी गई है, क्योंकि इसमें चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया है।
क्या है पूरा विवाद?
मार्च 2023 में ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सलाह पर होनी चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI शामिल हों। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा था कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस पर कोई कानून नहीं बना लेती।
दिसंबर 2023 में संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया गया। अब चयन समिति में निम्नलिखित सदस्य हैं:
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प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
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एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (प्रधानमंत्री द्वारा नामित)
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लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
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सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी और रुख
बुधवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि पिछला फैसला (CJI को शामिल करने का) केवल एक ‘स्टॉप-गैप’ व्यवस्था थी क्योंकि उस समय कोई कानून मौजूद नहीं था। कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख बातें कहीं:
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संसदीय संप्रभुता: कानून बनाना पूरी तरह से संसद का कार्यक्षेत्र है। कोर्ट संसद को विशेष मानदंडों के साथ कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
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कानूनी शून्यता का अंत: चूंकि अब संसद ने कानून बना दिया है, इसलिए पुराने फैसले की ‘अस्थायी व्यवस्था’ स्वतः समाप्त हो गई है।
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संवैधानिक वैधता की जांच: हालांकि कोर्ट ने कानून बनाने में हस्तक्षेप से इनकार किया, लेकिन उसने यह स्पष्ट किया कि वह इस बात की जांच जरूर करेगा कि क्या नया कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं करता।
याचिकाकर्ताओं की चिंताएं
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि चयन समिति में दो सरकारी सदस्य (PM और मंत्री) होने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि यह ‘शक्ति पृथक्करण’ के सिद्धांत के खिलाफ है और कार्यपालिका को नियुक्ति पर पूर्ण नियंत्रण देता है।
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