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केरल के पलक्कड़ में ‘इस्लाम-फ्रेंडली’ जिम पर छिड़ी रार: निजी पसंद या सामाजिक अलगाव की शुरुआत?

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पलक्कड़ । गुरुवार, 4 जून, 2026

केरल के पलक्कड़ जिले से सामने आए एक हालिया मामले ने इंटरनेट पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक समरसता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। पलक्कड़ के पुथुनगरम इलाके में पिछले 15 वर्षों से चल रहे एक स्थापित फिटनेस सेंटर के मालिक ने अपने कमर्शियल स्पेस को पूरी तरह से ‘इस्लाम-फ्रेंडली’ (Islamic-Friendly) नियमों के तहत संचालित करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

क्या हैं जिम के नए ‘इस्लामिक’ नियम?

जिम के प्रोप्राइटर द्वारा सोशल मीडिया पर जारी की गई नई गाइडलाइंस के अनुसार, अब इस फिटनेस सेंटर में निम्नलिखित बदलाव पूरी तरह लागू कर दिए गए हैं:

  1. म्यूजिक पर पूर्ण प्रतिबंध: वर्कआउट के दौरान बैकग्राउंड में बजने वाले किसी भी तरह के संगीत या गानों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

  2. धार्मिक ड्रेस कोड: कसरत के समय पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शरीर के आवश्यक हिस्सों को ढकने वाले शालीन कपड़े पहनना अनिवार्य है। महिला सदस्यों के लिए वर्कआउट के दौरान भी हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है।

  3. लिंग-आधारित अलग पारियां (Shifts): पुरुष और महिला सदस्य एक साथ कसरत नहीं कर सकेंगे। दोनों के लिए अलग-अलग समय निर्धारित किया गया है।

जिम मालिक का दावा है कि उनका मकसद उन लोगों को एक सहज माहौल देना है जो अपनी फिटनेस के साथ-साथ अपनी धार्मिक मान्यताओं और मूल्यों का भी कड़ाई से पालन करना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिम के दरवाजे सभी धर्मों के लोगों के लिए खुले हैं, बशर्ते वे इन शर्तों को मानने के लिए तैयार हों।

सोशल मीडिया पर क्यों भिड़े लोग? (पक्ष और विपक्ष के तर्क)

इस खबर के वायरल होते ही इंटरनेट यूजर्स मुख्य रूप से दो गुटों में बंट गए हैं। दोनों पक्षों की ओर से दिए जा रहे मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:

1. समर्थकों का पक्ष: ‘यह बिजनेस और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है’

समर्थकों का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर नागरिक को कानून के दायरे में रहकर अपना व्यवसाय चलाने की आजादी है।

  • उनका तर्क है कि चूंकि यह एक निजी संपत्ति (Private Business) है, इसलिए मालिक को अपनी टारगेट ऑडियंस और व्यावसायिक मॉडल के हिसाब से नियम तय करने का पूरा अधिकार है।

  • कई यूजर्स का मानना है कि यह उन महिलाओं या पुरुषों के लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है जो रूढ़िवादी या धार्मिक कारणों से सामान्य को-एड (Co-ed) जिम जाने में झिझकते थे।

2. आलोचकों का पक्ष: ‘यह समाज में अलगाव बढ़ाने वाला कदम है’

दूसरी तरफ, आलोचकों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक या व्यावसायिक जगहों को धार्मिक रंग देना समाज के लिए ठीक नहीं है।

  • सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे ‘शरिया’ और ‘तालिबानी’ मानसिकता की एंट्री बताते हुए चिंता व्यक्त की है।

  • आलोचकों का कहना है कि जब हम सार्वजनिक स्थानों पर समावेशी (Inclusive) माहौल की बात करते हैं, तो इस तरह के नियम समाज में दूरियां और अलगाव (Segregation) पैदा करते हैं। विशेषकर महिलाओं के लिए कसरत के दौरान हिजाब की अनिवार्यता को प्रगतिशीलता के खिलाफ माना जा रहा है।

कानूनी और सामाजिक पहलू: क्या कहता है नियम?

भारत के संविधान के तहत हर नागरिक को अपने धर्म के पालन और व्यापार की स्वतंत्रता है, जब तक कि वह देश के किसी मौजूदा कानून या लोक व्यवस्था (Public Order) का उल्लंघन न करे। चूंकि यह एक निजी कमर्शियल स्पेस है और इसमें किसी धर्म विशेष के प्रवेश पर रोक नहीं लगाई गई है (केवल नियम मानने की शर्त है), इसलिए तकनीकी और कानूनी रूप से इसे सीधे तौर पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

फिर भी, यह मामला एक बड़े विमर्श को जन्म देता है कि आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष समाज में व्यावसायिक स्वतंत्रता की सीमा कहां खत्म होती है और सामाजिक ताने-बाने की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है।

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