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ऊर्जा संकट का समाधान: एलपीजी की किल्लत के बीच ‘बायोगैस’ बना ग्रामीण भारत का नया सहारा

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एक साधारण बायोगैस प्लांट का आरेख जिसमें इनलेट, डाइजेस्टर टैंक और गैस पाइप दिखाया गया है।

नई दिल्ली । गुरुवार, 7 मई 2026

ईरान-इजरायल संघर्ष और वैश्विक अस्थिरता के चलते भारत के कई राज्यों में ऊर्जा संकट गहरा गया है। एलपीजी (कुकिंग गैस) की आपूर्ति में बाधा आने से आम आदमी की रसोई का बजट और सुकून दोनों बिगड़ गए हैं। जहाँ शहरों में लोग गैस की पैनिक बुकिंग और लंबी लाइनों से परेशान हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों ने इसका एक आत्मनिर्भर और सस्ता विकल्प ढूंढ निकाला है— बायोगैस

एलपीजी संकट: जमीनी हकीकत और चुनौतियां

भारत अपनी एलपीजी खपत का 50% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। वर्तमान युद्ध की स्थिति ने समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित किया है, जिससे गैस की सप्लाई चेन टूट गई है।

  • सप्लाई में देरी: बुकिंग के 10-15 दिन बाद भी सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं।

  • कालाबाजारी: संकट का फायदा उठाकर कुछ क्षेत्रों में सिलेंडर ऊंचे दामों पर बेचे जा रहे हैं।

  • सरकारी पक्ष: सरकार ने स्पष्ट किया है कि भंडार पर्याप्त है, लेकिन ‘पैनिक बुकिंग’ और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं ने किल्लत पैदा कर दी है।

बायोगैस: नेकपुर की गौरी देवी ने दिखाई राह

उत्तर प्रदेश के नेकपुर गांव की 25 वर्षीय गौरी देवी आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं। जब उनके गांव में एलपीजी की सप्लाई बंद हुई, तो उन्होंने अपने घर के बायोगैस प्लांट को मुख्य साधन बनाया।

“गोबर और पानी के घोल से जो गैस बनती है, उससे रोटी, सब्जी और दाल आसानी से पक जाती है। अब हमें गैस एजेंसी के चक्कर नहीं काटने पड़ते।” — गौरी देवी

कैसे काम करता है यह ‘मिनी गैस प्लांट’?

बायोगैस प्लांट एक भूमिगत टैंक (डाइजेस्टर) होता है। इसमें पशुओं का गोबर और पानी बराबर मात्रा में मिलाया जाता है। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में यह मिश्रण सड़ता है और मीथेन गैस पैदा करता है। यह गैस पाइप के माध्यम से सीधे रसोई के चूल्हे तक पहुँचती है।

‘काला सोना’: बायोगैस का दोहरा लाभ

बायोगैस का उपयोग केवल खाना पकाने तक सीमित नहीं है। इस प्रक्रिया के बाद निकलने वाला अपशिष्ट, जिसे ‘स्लरी’ कहा जाता है, खेतों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

  1. जैविक खाद: इसे किसान ‘काला सोना’ कहते हैं क्योंकि यह यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों से कहीं अधिक उपजाऊ है।

  2. लागत में कमी: रसायनों पर होने वाला खर्च शून्य हो जाता है और मिट्टी की सेहत बनी रहती है।

सरकार की पहल और भविष्य का लक्ष्य

भारत सरकार ने 2070 तक नेट-जीरो (कार्बन न्यूट्रल) बनने का संकल्प लिया है। इस दिशा में बायोगैस एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

  • सब्सिडी: एक छोटे बायोगैस प्लांट की लागत ₹25,000 से ₹30,000 आती है, जिसमें सरकार द्वारा महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

  • वेस्ट-टू-वेल्थ: सरकार अब बड़े स्तर पर ‘कंप्रेस्ड बायो-गैस’ (CBG) को भी बढ़ावा दे रही है।

निष्कर्ष: संकट से आत्मनिर्भरता की ओर

एलपीजी संकट ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम आयातित ईंधन पर कितने निर्भर हैं। बायोगैस न केवल ग्रामीण ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती है, बल्कि प्रदूषण कम करने और कचरा प्रबंधन में भी मदद करती है। समय आ गया है कि इस ‘स्वदेशी ऊर्जा’ को हर गांव के घर-घर तक पहुँचाया जाए।

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