वॉशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी सुधारों को लेकर कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। रविवार को एक कड़े बयान में राष्ट्रपति ने घोषणा की कि वे तब तक किसी भी विधायी विधेयक (Bill) पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, जब तक कि कांग्रेस ‘सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी एक्ट’ (SAVE Act) को पूरी तरह से मंजूरी नहीं दे देती।
राष्ट्रपति के इस अल्टीमेटम ने वॉशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जिससे आने वाले हफ्तों में विधायी गतिरोध (Legislative Gridlock) की स्थिति पैदा होने की आशंका है।
क्या है विवाद की जड़?
राष्ट्रपति जिस SAVE Act पर जोर दे रहे हैं, उसका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी चुनाव प्रणाली में सख्ती लाना है। इस बिल के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
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नागरिकता का प्रमाण: मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना अनिवार्य होगा।
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अधिकारियों पर कार्रवाई: बिना वैध दस्तावेजों के पंजीकरण करने वाले चुनाव अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे का प्रावधान।
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पहचान की अनिवार्यता: मतदान के दिन फोटो युक्त पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य करना।
राजनीतिक खींचतान और विरोध
यह विधेयक फरवरी में प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से पारित हो चुका है, जहाँ रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है। हालांकि, सीनेट (Senate) में इसे विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
विपक्ष का तर्क: डेमोक्रेटिक नेताओं ने इस बिल को “मतदाता दमन” (Voter Suppression) करार दिया है। उनका कहना है कि नागरिकता के भौतिक दस्तावेज मांगना गरीब, बुजुर्गों और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए बाधा बनेगा, जिससे वे अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
मध्यावधि चुनावों का साया
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति का यह सख्त रुख नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) को ध्यान में रखकर अपनाया गया है।
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यदि विपक्षी दल प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के अंतिम दो वर्ष विधायी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
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स्वतंत्र विश्लेषकों के अनुसार, इस समय डेमोक्रेटिक पार्टी के पास हाउस में वापसी की प्रबल संभावनाएं हैं, जिससे ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी सीनेट पर टिकी हैं। यदि सीनेट में यह बिल अटकता है, तो राष्ट्रपति के वीटो पावर और हस्ताक्षर न करने की जिद से अमेरिका का बजट सत्र और अन्य महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच यह टकराव अमेरिकी लोकतंत्र के लिए एक नई परीक्षा साबित हो सकता है।
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