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ऐतिहासिक सच या नया विवाद? भरूच की जामा मस्जिद के 700 साल पुराने तहखाने से मिलीं प्राचीन जैन और हिंदू मूर्तियां

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भरूच की जामा मस्जिद का ऐतिहासिक ढांचा और एएसआई सुरक्षा का बोर्ड.

भरूच । बुधवार, 10 जून 2026

गुजरात के ऐतिहासिक शहर भरूच में स्थित प्राचीन जुम्मा (जामा) मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर आ गया है। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें इस मस्जिद के बेसमेंट (तहखाने) के भीतर प्राचीन जैन और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई दे रही हैं। संतों और पुरातत्व विभाग (ASI) के हस्तक्षेप के बाद इस मामले ने देशव्यापी ध्यान आकर्षित किया है।

क्या है वायरल वीडियो का सच?

वायरल हो रहे वीडियो में मस्जिद के नीचे बने एक पुराने तहखाने के भीतर कई प्राचीन प्रतिमाएं दिखाई दे रही हैं। इन प्रतिमाओं में:

  • 19वें जैन तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी की एक महत्वपूर्ण मूर्ति।

  • भगवान गणेश और हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमाएं।

  • मस्जिद के खंभों और दीवारों पर साफ तौर पर दिखने वाली जैन और हिंदू शैली की प्राचीन नक्काशी।

पुरातत्व विभाग के सूत्रों के अनुसार, इन मूर्तियों पर विक्रम संवत 1213 (लगभग 12वीं शताब्दी) का एक शिलालेख भी अंकित है, जो यह साबित करता है कि ये कलाकृतियां लगभग 800 साल से भी अधिक पुरानी हैं।

संतों का दावा: यह ‘जैन समरी विहार’ था

भरूच के नवचोकी ओवारा स्थित शंकरचार्य मठ के महांत स्वामी मुक्तानंद और विभिन्न हिंदू व जैन संगठनों ने इस वीडियो के सामने आने के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी है। संतों का दावा है कि इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता। उनके अनुसार, यह स्थल मूल रूप से एक भव्य जैन मंदिर परिसर था जिसे ‘जैन समरी विहार’ कहा जाता था और यह चक्रधर्सवामी का जन्मस्थान भी माना जाता है।

दावा किया जा रहा है कि 13वीं-14वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर इसके अवशेषों पर मस्जिद का निर्माण किया गया था। संतों की मांग है कि चूंकि यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है, इसलिए इसका प्रबंधन पूरी तरह से एएसआई के नियमों के तहत होना चाहिए।

मुस्लिम पक्ष और ट्रस्ट की दलील

दूसरी ओर, जुम्मा मस्जिद के ट्रस्टी अब्दुल कामठी ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह मस्जिद वर्ष 1907 से ही भारत सरकार के गजट (Gazette) में दर्ज है और इसका संचालन वक्फ बोर्ड के अंतर्गत आने वाले एक पंजीकृत ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि यहाँ सदियों से जुमे की नमाज अदा की जा रही है और कुछ असामाजिक तत्व जानबूझकर सौहार्द बिगाड़ने के लिए नया विवाद पैदा कर रहे हैं। ट्रस्ट ने इस मामले में कानूनी रास्ता अपनाने और उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकीलों से सलाह लेने की बात कही है।

प्रशासन और ASI की सख्त कार्रवाई

तनाव को बढ़ता देख स्थानीय प्रशासन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने तुरंत कदम उठाए हैं:

  1. अतिक्रमण पर बुलडोजर: मस्जिद परिसर के भीतर बिना अनुमति के बनाए गए अवैध शेड और ‘वज़ूखाना’ से जुड़े कुछ नए निर्माणों को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया है।

  2. तहखाना सील: कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक शांति बनाए रखने के लिए प्रशासन ने उस मुख्य दरवाजे को आधिकारिक तौर पर सील (Lock) कर दिया है, जो इस विवादित बेसमेंट की तरफ जाता है।

  3. जांच रिपोर्ट: पुरातत्व विभाग ने मौके पर जाकर पूरे परिसर और मूर्तियों की वीडियोग्राफी कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है, जिसे उच्च अधिकारियों को भेज दिया गया है।

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