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बैंकॉक एरावन हिंदू मंदिर ब्लास्ट: थाईलैंड कोर्ट ने 2 उइगर मुस्लिमों को सुनाई मौत की सजा, जानें मामले की पूरी कड़ियां

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
8 Min Read

बैंकॉक । गुरुवार, 11 जून 2026

थाईलैंड की एक शीर्ष नागरिक अदालत ने साल 2015 में राजधानी बैंकॉक के ऐतिहासिक और बेहद लोकप्रिय एरावन मंदिर (Erawan Shrine) में हुए भीषण बम विस्फोट के मामले में एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। बैंकॉक साउथ क्रिमिनल कोर्ट ने इस जघन्य आतंकी हमले के लिए चीन के शिनजियांग प्रांत के मुस्लिम उइगर समुदाय से ताल्लुक रखने वाले दो मुख्य आरोपियों को दोषी करार देते हुए ‘मौत की सजा’ (Death Penalty) सुनाई है।

इस आतंकी हमले ने न केवल थाईलैंड बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था, क्योंकि निशाना एक ऐसा पवित्र धार्मिक स्थल था जहां हर साल लाखों की संख्या में स्थानीय श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक, विशेषकर चीनी नागरिक, दर्शन के लिए आते हैं।

क्या था 2015 का एरावन मंदिर ब्लास्ट?

17 अगस्त 2015 की शाम को बैंकॉक के केंद्र में स्थित प्रसिद्ध एरावन मंदिर में एक शक्तिशाली बम धमाका हुआ था। यह मंदिर हिंदू देवता भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। इस दिल दहला देने वाले हमले में 20 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जिनमें 7 चीनी नागरिक भी शामिल थे। इसके अलावा, हादसे में 120 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

जांच एजेंसियों ने कड़ी मशक्कत के बाद सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल फॉरेंसिक और फिंगरप्रिंट्स के आधार पर दो मुख्य संदिग्धों को गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान युसुफु मियराइली (Yusufu Mieraili) और बिलाल मोहम्मद (Bilal Mohammad) (जिसे आदेम करादाग के नाम से भी जाना जाता है) के रूप में हुई थी।

कोर्ट का फैसला और ठोस सबूतों का आधार

बैंकॉक साउथ क्रिमिनल कोर्ट में चार जजों की विशेष बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने दोनों आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और अचूक सबूत पेश किए हैं।

  • भूमिकाओं का वर्गीकरण: जांच के अनुसार, बिलाल मोहम्मद ने धमाके से ठीक कुछ मिनट पहले विस्फोटक सामग्री से भरा एक लावारिस बैग मंदिर परिसर में बेंच के नीचे रखा था। वहीं, युसुफु मियराइली ने दूर से उस बम को रिमोट या अन्य माध्यम से नियंत्रित कर ब्लास्ट किया था।

  • वैज्ञानिक साक्ष्य: कोर्ट ने कहा कि घटनास्थल और संदिग्धों के ठिकानों से मिले फिंगरप्रिंट्स, वीडियो फुटेज और फॉरेंसिक साक्ष्य दोनों का इस हमले से सीधा संबंध स्थापित करते हैं।

  • बचाव पक्ष की विफलता: कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी जोड़ा कि दोनों आरोपी अपने बचाव में ऐसा कोई ठोस तर्क या प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे उनके खिलाफ लगे आरोपों को खारिज किया जा सके।

भाषा की बाधा और 11 साल लंबा खिंचा ट्रायल

यह मुकदमा थाईलैंड के इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में से एक बन गया। साल 2015 की घटना का फैसला आने में करीब 11 साल का समय लग गया। इसके पीछे कई तकनीकी और कानूनी कारण रहे:

  1. अदालत का ट्रांसफर: शुरुआत में इस संवेदनशील मामले की सुनवाई सैन्य अदालत (Military Court) में चल रही थी। बाद में, साल 2019 में इसे नागरिक अदालत यानी बैंकॉक साउथ क्रिमिनल कोर्ट में स्थानांतरित किया गया।

  2. अनुवादकों (Translators) की भारी कमी: सबसे बड़ी चुनौती भाषा की थी। आरोपी उइगर भाषा बोलते थे, जबकि थाईलैंड की अदालत में केवल अंग्रेजी दुभाषिए उपलब्ध थे। उपयुक्त उइगर-थाई अनुवादक न मिलने के कारण सुनवाई को दर्जनों बार टालना पड़ा। इस दौरान युसुफु ने खुद हिरासत में टूटी-फूटी थाई भाषा सीखी और अपने साथी बिलाल के लिए कोर्ट रूम में अनुवाद किया।

आरोपी का दावा: ‘मैं निर्दोष हूं, मुझे न्याय नहीं मिला’

अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद कोर्ट रूम में नाटकीय दृश्य देखने को मिला। दोषी युसुफु मियराइली ने भावुक होते हुए थाई भाषा में चिल्लाकर कहा:

“मैं इस फैसले को स्वीकार नहीं करता। मैं पूरी तरह निर्दोष हूं। मुझे यहां न्याय नहीं मिला है। मैं थाईलैंड के नागरिकों से अपील करता हूं कि वे मेरी सच्चाई जानने में मेरी मदद करें।”

शुरुआती पूछताछ के दौरान दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, लेकिन 2016 में जब औपचारिक ट्रायल शुरू हुआ, तो वे अपने बयान से पलट गए। उन्होंने आरोप लगाया कि जेल में उन्हें प्रताड़ित किया गया और यातनाएं देकर जबरन कबूलनामे पर दस्तखत कराए गए। हालांकि, अदालत ने अपने अंतिम फैसले में कहा कि प्रताड़ना या दबाव बनाए जाने का कोई भी मेडिकल या कानूनी प्रमाण नहीं मिला है। आरोपियों के वकील चुचार्ट कानपाई ने कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेंगे।

वैश्विक प्रतिक्रियाएं: चीन का समर्थन बनाम मानवाधिकार संगठनों के सवाल

चीन का रुख

हमले में अपने नागरिकों को खोने वाले चीन ने थाईलैंड कोर्ट के इस फैसले की सराहना की है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि यह हमला बेहद अमानवीय और जघन्य था। चीन अपनी कानूनी संप्रभुता के तहत आतंकवादियों को सख्त सजा देने के थाईलैंड के इस कदम का पूरी तरह समर्थन करता है।

मानवाधिकार संगठनों की चिंताएं

दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस लंबे ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। फ्रांस स्थित ‘इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स’ ने संयुक्त राष्ट्र (UN) को एक याचिका सौंपकर आरोप लगाया था कि हिरासत के दौरान आरोपियों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। पुलिस ने शुरुआती जांच में कुल 17 संदिग्धों की पहचान की थी, लेकिन केवल 3 की ही गिरफ्तारी हो सकी। इनमें से भी एक थाई महिला को साल 2024 में सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया गया था।

हमले के पीछे असली मंशा क्या थी?

थाई सुरक्षा एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के पास इस धमाके के पीछे दो प्रमुख थ्योरी हैं:

  • मानव तस्करी गिरोह का बदला: थाईलैंड सरकार के आधिकारिक दावों के अनुसार, यह हमला किसी वैश्विक आतंकी संगठन का काम नहीं, बल्कि मानव तस्करी (Human Trafficking) से जुड़े एक बड़े सिंडिकेट का बदला था। दरअसल, साल 2015 में थाईलैंड पुलिस ने थाईलैंड-मलेशिया सीमा के जंगलों में बड़े पैमाने पर छापेमारी कर मानव तस्करों के अवैध कैंपों को नष्ट किया था, जिससे बौखलाकर अपराधियों ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया।

  • उइगर प्रवासियों का मुद्दा: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले का संबंध थाईलैंड सरकार द्वारा उसी वर्ष (2015 में) करीब 100 से अधिक उइगर मुस्लिम प्रवासियों को जबरन वापस चीन डिपोर्ट (निर्वासित) करने के फैसले से भी हो सकता है, जिसके विरोध में उइगर चरमपंथियों ने चीनी पर्यटकों को निशाना बनाया।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।