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समाज में संघ को मिली मान्यता स्वयंसेवकों की तपस्या और साधना का परिणाम है – अलकाताई

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस संघ शताब्दी वर्ष

प्रयागराज। माघ मेला स्थित परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका अलकाताई ने कहा कि त्यागी तथा समर्पणशील स्वयंसेवकों की साधना के कारण आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है। समाज में संघ को जो मान्यता मिली है, उसके पीछे स्वयंसेवकों की तपस्या और कठोर साधना है। इस साधना के कारण ही समाज में हिन्दुत्व का ज्वार दिखाई दे रहा है।

उन्होंने शंखध्वनि तथा वैदिक स्वस्ति वाचन के बीच दीप प्रज्ज्वलित कर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। प्रांत संघचालक अंगराज जी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री आशीष चौहान जी सहित अन्य उपस्थित रहे।

अलका ताई ने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे आज की अनुकूल परिस्थितियां देखकर तनिक भी शिथिल न पड़ें, बल्कि दोगुने उत्साह से परम वैभव के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास जारी रखें। लक्ष्य प्राप्ति के लिए और अधिक परिश्रम की आवश्यकता है। अभी काम बहुत बाकी है। हर क्षेत्र में संघ की विचारधारा को लेकर जाना है।

उन्होंने कहा कि वरिष्ठ प्रचारक यादवराव जोशी जी जब कर्नाटक में प्रचारक बन कर गए तो उन्हें कन्नड़ भाषा नहीं आती थी। एकदम अपरिचित परिवार में जाकर विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने आत्मीयता स्थापित की तथा संगठन की नींव मजबूत कर कार्यक्षेत्र में विस्तार किया।

आशीष चौहान ने कहा कि जब पूरे विश्व में उपनिवेशवादी शक्तियां हावी थीं, पश्चिम की औद्योगिक क्रांति का दौर चल रहा था। ऐसे परिवेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार जी ने भारत को भारत के रास्ते से चलाने का मार्ग खोजा। उन्होंने एक साथ देश को स्वाधीन कराने तथा देश फिर से गुलाम न हो, इसके लिए चिंतन किया तथा समाज की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का यत्न किया।

एक दौर वह था, जब नारा लगवाया जाता था कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। लेकिन आज युवा पीढ़ी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वयं लिख रही है कि हिन्दू होने पर हमें गर्व है। पंच परिवर्तन के विषय पर आज संघ जो बोल रहा है, वही पूरा समाज बोलने लगे यही संघ का लक्ष्य है।

कार्यक्रम का संचालन विभाग कार्यवाह प्रोफेसर संजय जी ने किया।

साभार : विश्व संवाद केंद्र

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