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हिंदू धर्म: मंदिर जाने की अनिवार्यता नहीं, जीवनशैली ही पहचान है — सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली । बुधवार, 13 मई 2026

सबरीमला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर लैंगिक भेदभाव को लेकर चल रही नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ की सुनवाई में एक ऐतिहासिक वैचारिक मोड़ आया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म की जड़ें किसी संगठित ढांचे के बजाय व्यक्तिगत विश्वास और सादगी में निहित हैं।

न्यायालय ने टिप्पणी की:

“लोग अपनी झोपड़ी में दीपक जलाते हैं, बस इतना ही काफी है। लोगों को अपने धर्म का पालन करने से कोई नहीं रोक सकता।”

‘जीवनशैली’ के रूप में हिंदू धर्म

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने धर्म की पारंपरिक परिभाषा से इतर एक व्यापक दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा कि एक हिंदू व्यक्ति वह भी बना रहता है जो न तो मंदिर जाता है और न ही घर में कोई विशेष पूजा स्थल रखता है। यह एक ‘मानसिकता’ और ‘जीवनशैली’ है।

इस तर्क का समर्थन करते हुए प्रोफेसर जी. मोहन गोपाल ने कहा कि भारत की एक बड़ी आबादी ‘स्व-ईश्वरवादी’ है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति स्वयं यह तय करता है कि उसके लिए क्या पवित्र है। उन्होंने ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ (Liberty of Conscience) पर बल देते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 इसी की रक्षा करता है।

नागरिक स्वतंत्रता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता

इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जहाँ प्रोफेसर गोपाल ने अमेरिकी न्यायशास्त्र का उदाहरण देते हुए कहा कि “आप अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग किसी अन्य व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को छीनने के लिए नहीं कर सकते।”

यह तर्क सबरीमला मामले के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ एक ओर मंदिर के पुजारी और भक्त अपनी ‘धार्मिक मान्यताओं’ की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाएं ‘समानता और नागरिक अधिकारों’ की मांग करती हैं।

प्रमुख सुधार और कानूनी बिंदु

सुनवाई के दौरान कुछ प्रमुख बातें उभर कर सामने आईं:

  • पुनर्परिभाषा की आवश्यकता: हिंदू की कानूनी परिभाषा को ‘जीवनशैली’ के संदर्भ में फिर से देखने की जरूरत है ताकि वह संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो।

  • अनुच्छेद 25 का विस्तार: क्या अनुच्छेद 25 केवल संगठित धर्मों को संरक्षण देता है या किसी अकेले व्यक्ति की निजी आस्था (स्व-धर्मवाद) को भी?

  • अनिवार्य प्रथा का सिद्धांत: कोर्ट अब यह परख रहा है कि क्या मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध वास्तव में धर्म का ‘अनिवार्य’ हिस्सा है या केवल एक सामाजिक प्रथा।

संविधान पीठ के सदस्य

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में निम्नलिखित न्यायाधीश शामिल हैं:

  1. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

  2. न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना

  3. न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश

  4. न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह

  5. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार

  6. न्यायमूर्ति अगस्त्य जॉर्ज मसीह

  7. न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले

  8. न्यायमूर्ति आर महादेवन

  9. न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियाँ न केवल सबरीमला मामले को प्रभावित करेंगी, बल्कि भविष्य में धर्म, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच के संबंधों को भी नई दिशा देंगी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्म ‘थोपनी’ वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है।

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