सोमवार, मार्च 23 2026 | 02:39:41 PM
Breaking News
Home / अंतर्राष्ट्रीय / होरमुज जलडमरूमध्य में गहराया संकट: क्या दुनिया फिर से तेल की किल्लत की ओर बढ़ रही है?

होरमुज जलडमरूमध्य में गहराया संकट: क्या दुनिया फिर से तेल की किल्लत की ओर बढ़ रही है?

Follow us on:

होरमुज जलडमरूमध्य का नक्शा जो ईरान और ओमान के बीच की रणनीतिक स्थिति दिखाता है।

वॉशिंगटन. पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति गरमा गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए एक साझा सैन्य गठबंधन बनाने की अपील को बड़ा झटका लगा है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख सहयोगियों ने इस क्षेत्र में अपने युद्धपोत भेजने से फिलहाल साफ इनकार कर दिया है।

जापान और ऑस्ट्रेलिया का ‘नो’ – क्या हैं कारण?

जापान ने इस मिशन से दूरी बनाए रखने के लिए अपनी संवैधानिक और कानूनी सीमाओं का हवाला दिया है। जापानी सरकार का मानना है कि सीधे सैन्य भागीदारी उनके शांतिवादी संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकती है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने भी स्पष्ट किया है कि वह इस तनावपूर्ण क्षेत्र में सीधे सैन्य तैनाती करके स्थिति को और अधिक जटिल नहीं बनाना चाहता।

इन दो प्रमुख देशों का पीछे हटना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका इस बार सुरक्षा का खर्च और जिम्मेदारी उन देशों के साथ साझा करना चाहता है जो इस मार्ग से सबसे ज्यादा तेल आयात करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय समाचार: matribhumisamachar.com/international-news

क्यों खास है होरमुज जलडमरूमध्य?

दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ‘धमनी’ कहे जाने वाले इस समुद्री मार्ग का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • तेल का प्रवाह: दुनिया के कुल कच्चे तेल के परिवहन का लगभग 20% से 30% हिस्सा इसी संकीर्ण मार्ग से गुजरता है।

  • ऊर्जा सुरक्षा: चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों की ऊर्जा जरूरतें पूरी तरह इसी मार्ग पर टिकी हैं।

  • वैश्विक व्यापार: यह मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अनिवार्य है।

व्यापार और अर्थव्यवस्था: matribhumisamachar.com/business

अमेरिका की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ और सहयोगियों की हिचकिचाहट

राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया सहित कई देशों से संपर्क साधा है। ट्रंप का तर्क सीधा है: “जो देश यहां से तेल ले रहे हैं, उन्हें ही इसकी सुरक्षा की कीमत चुकानी चाहिए।” हालांकि, यूरोपीय देश (विशेषकर फ्रांस और जर्मनी) अमेरिका की इस रणनीति से इत्तेफाक नहीं रखते। वे ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक बातचीत के पक्षधर हैं। ब्रिटेन ने कुछ तकनीकी सहयोग के संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन पूर्ण सैन्य भागीदारी पर अब भी सस्पेंस बरकरार है।

संपादकीय विश्लेषण: matribhumisamachar.com/editorial

भारत और वैश्विक बाजार पर क्या होगा असर?

यदि होरमुज जलडमरूमध्य में तनाव इसी तरह बढ़ता रहा और कोई ठोस सुरक्षा व्यवस्था नहीं बनी, तो इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं:

  1. तेल की कीमतों में उछाल: कच्चे तेल की कीमतें $100-110 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे भारत जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे।

  2. सप्लाई चेन में रुकावट: मालवाहक जहाजों का बीमा (Insurance) महंगा होने से वैश्विक महंगाई दर बढ़ सकती है।

  3. क्षेत्रीय अस्थिरता: अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी छोटी सी गलतफहमी से बड़े क्षेत्रीय युद्ध की शुरुआत हो सकती है।

विशेषज्ञों की राय: “बिना अंतरराष्ट्रीय आम सहमति के इस क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करना नामुमकिन है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और सहयोगियों की अपनी मजबूरियां इस संकट को और लंबा खींच सकती हैं।”

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

मिडिल ईस्ट में महायुद्ध के बीच भारत की बड़ी जीत: अमेरिका से LPG लेकर मंगलुरु पहुंचा ‘पाइक्सिस पायनियर’, क्या अब कम होंगे दाम?

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (Mid-East) में बढ़ते भीषण तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण वैश्विक …