नई दिल्ली । मंगलवार, 16 जून 2026
एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के लिए आने वाले दिन रणनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौती लेकर आने वाले हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है भारत का ‘रेयर अर्थ्स प्रोडक्शन’ (Rare Earths Production) की दिशा में तेजी से बढ़ता कदम। इस महा-योजना में भारत का हाथ दुनिया की दिग्गज जापानी कंपनी थामने जा रही है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में जापानी कंपनी करीब ₹2,250 करोड़ का बड़ा निवेश करने की तैयारी में है।
जिस तरह भारत ने हाल के वर्षों में सेमीकंडक्टर (चिप्स) के मोर्चे पर ‘आत्मनिर्भर भारत’ की एक नई इबारत लिखी है, ठीक उसी तरह अब केंद्र सरकार का अगला बड़ा लक्ष्य रेयर अर्थ्स और एडवांस मटीरियल्स के सेक्टर में ग्लोबल सप्लाई चेन से चीन के एकाधिकार (Monopoly) को पूरी तरह समाप्त करना है।
आंध्र प्रदेश में हो गई बड़ी डील: अच्युतापुरम बनेगा नया हब
एडवांस्ड मटीरियल्स और मैग्नेटिक टेक्नोलॉजी के सेक्टर में दुनिया की अग्रणी जापानी कंपनी ‘प्रोटेरियल’ (Proterial)—जिसे पहले हिताची मेटल्स (Hitachi Metals) के नाम से जाना जाता था—आंध्र प्रदेश में ₹2,250 करोड़ का भारी-भरकम निवेश करने जा रही है। यह प्लांट राज्य के अनाकापल्ली जिले के अच्युतापुरम में स्थापित किया जाएगा।
इस प्लांट की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
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प्रोडक्ट: ‘सिंटर्ड नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन’ (NdFeB) परमानेंट मैग्नेट।
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सालाना क्षमता: 1.2 किलो टन प्रति वर्ष (1.2 ktpa)।
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स्थिति: आंध्र प्रदेश की ‘इन्वेस्टमेंट प्रमोशन कमेटी’ ने इस मेगा प्रोजेक्ट को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है।
ये विशेष रूप से तैयार किए गए चुंबक (Permanent Magnets) कोई साधारण चुंबक नहीं हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), विंड टर्बाइंस, एडवांस इंडस्ट्रियल मोटर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और देश के सबसे संवेदनशील डिफेंस सिस्टम (मिसाइल और रडार टेक्नोलॉजी) में बेहद महत्वपूर्ण घटकों (Components) के रूप में किया जाता है।
लेटेस्ट अपडेट
इस पूरी डील और भारत की रणनीति को गहराई से समझने के लिए कुछ हालिया घटनाक्रमों और तथ्यों में सुधार को जानना आवश्यक है:
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फीडस्टॉक की चुनौती (The Sourcing Nuance): अक्सर यह समझा जाता है कि मैग्नेट प्लांट लगते ही भारत रेयर अर्थ माइनिंग में स्वतंत्र हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है। भारत में अभी शुरुआती तौर पर ‘मिड-स्ट्रीम’ (यानी मैग्नेट बनाने की प्रक्रिया) पर ध्यान दिया जा रहा है। शुरुआत में इस प्लांट के लिए कच्चा माल (रेयर अर्थ ऑक्साइड या एलॉय) भारत को जापान के वैश्विक नेटवर्क या अन्य सहयोगी देशों से आयात करना पड़ सकता है, क्योंकि चीन के पास अभी भी रिफाइनिंग का सबसे बड़ा बुनियादी ढांचा है।
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केंद्र सरकार की ₹7,280 करोड़ की बड़ी योजना: केंद्र सरकार ने देश में ही ‘सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट’ (REPM) के एंड-टू-एंड प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए ₹7,280 करोड़ के एक विशाल इंसेंटिव प्रोग्राम को मंजूरी दी है। केंद्रीय मंत्रियों के अनुसार, अगले 3 से 4 वर्षों के भीतर भारत इस क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर होने की दिशा में बढ़ रहा है।
चीन के ‘किल स्विच’ और एकाधिकार पर लगेगी लगाम
वर्तमान में दुनिया के लगभग 90% रेयर अर्थ मैग्नेट्स का उत्पादन अकेले चीन करता है। कई बार वैश्विक विवादों के दौरान चीन ने इन खनिजों की सप्लाई रोकने की धमकी दी है, जिसे एक्सपर्ट्स ड्रैगन का ‘किल स्विच’ (Kill Switch) भी कहते हैं।
भारत और जापान की यह रणनीतिक जुगलबंदी सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि यह क्वाड (QUAD) देशों (भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया) के उस साझा संकल्प का हिस्सा है, जिसके तहत वे चीन के प्रभाव से मुक्त एक सुरक्षित और भरोसेमंद ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ सप्लाई चेन का निर्माण करना चाहते हैं। प्रोटेरियल कंपनी, जिसका सालाना कंसोलिडेटेड रेवेन्यू ₹45,000 करोड़ से अधिक है, अपनी विश्वस्तरीय पेटेंट तकनीक भारत लेकर आ रही है, जिससे भारत को इस रणनीतिक रेस में बहुत बड़ी बढ़त मिलेगी।
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