विनायक दामोदर सावरकर का जीवन केवल एक व्यक्ति का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस कठिनतम दौर का प्रतीक है जहाँ ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को लहू से सींचा गया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आकाश में विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक को कालकोठरी का अंधेरा भी कम नहीं कर सका। सावरकर का राष्ट्रवाद केवल नारों तक सीमित नहीं था; वह तपस्या, त्याग और बौद्धिक क्रांति का एक दुर्लभ संगम था।
1. ‘काला पानी’: जहाँ पत्थर भी रो पड़ते थे
1911 में जब सावरकर को दोहरे आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा सुनाकर अंडमान की सेलुलर जेल भेजा गया, तो ब्रिटिश हुकूमत का उद्देश्य केवल उन्हें कैद करना नहीं, बल्कि उनके मनोबल को तोड़ना था। सेलुलर जेल की बनावट ऐसी थी कि कोई भी कैदी दूसरे से बात नहीं कर सकता था।
सावरकर को ‘छह फुट लंबी और दस फुट चौड़ी’ एक ऐसी कोठरी में रखा गया, जहाँ न रोशनी थी और न ही हवा का उचित संचार। लेकिन सावरकर ने इसे ‘एकांत साधना’ का केंद्र बना लिया।
2. कोल्हू का बैल और शारीरिक यातनाएँ
सावरकर के संघर्ष का सबसे वीभत्स हिस्सा वह था जब उन्हें कोल्हू (Oil Mill) में जोता जाता था।
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अमानवीय श्रम: एक दिन में 30 पाउंड नारियल का तेल निकालना अनिवार्य था। यदि काम पूरा नहीं होता, तो उन्हें बेंतों से पीटा जाता था और हथकड़ियों में लटका दिया जाता था।
- भूख और प्यास: पीने के लिए गंदा पानी और खाने के लिए कीड़े युक्त भोजन दिया जाता था।
इतनी यातनाओं के बाद भी सावरकर के मुख पर शिकन नहीं होती थी। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि यदि मन स्वतंत्र है, तो शरीर की बेड़ियाँ अर्थहीन हैं।
3. दीवारों पर उकेरा गया साहित्य
सावरकर एक महान कवि और लेखक भी थे। जब जेलर बारी ने उनसे कागज और कलम छीन ली, तो उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने काँटों, कीलों और अपने नाखूनों को कलम बनाया और जेल की सफेद चूने वाली दीवारों को कागज।
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स्मृति की शक्ति: उन्होंने दीवारों पर ‘कमला’ और ‘सप्तर्षि’ जैसे महाकाव्यों की हजारों पंक्तियाँ लिखीं। जब उन्हें दूसरी कोठरी में स्थानांतरित किया जाता, तो वे उन पंक्तियों को याद कर लेते और अगली दीवार पर नई रचना शुरू करते।
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संदेशवाहक: उन्होंने जेल से छूटने वाले अन्य कैदियों को अपनी कविताएँ कंठस्थ करवाईं, ताकि वे बाहर जाकर देशवासियों में देशभक्ति की अलख जगा सकें।
4. वैचारिक क्रांति: हिंदुत्व और सामाजिक सुधार
जेल के भीतर सावरकर ने केवल ब्रिटिश हुकूमत से ही नहीं, बल्कि समाज की कुरीतियों से भी संघर्ष किया।
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धर्मान्तरण का विरोध: जेल में मुस्लिम वार्डरों द्वारा हिंदू कैदियों के जबरन धर्मान्तरण के खिलाफ उन्होंने जमकर आवाज उठाई और कैदियों को अपने धर्म और संस्कृति पर गर्व करना सिखाया।
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जातिवाद पर प्रहार: सावरकर का मानना था कि भारत की गुलामी का बड़ा कारण जातिवाद और छुआछूत है। उन्होंने जेल में ‘अछूत’ समझे जाने वाले भाइयों को शिक्षा दी और उनके साथ बैठकर भोजन किया।
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हिंदुत्व की परिभाषा: उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति भारत को अपनी ‘पितृभूमि’ और ‘पुण्यभूमि’ मानता है, वह इस राष्ट्र का अभिन्न अंग है।
5. सावरकर का राष्ट्रवाद: आज के संदर्भ में
सावरकर का राष्ट्रवाद ‘सशक्त भारत’ का समर्थक था। वे अहिंसा के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका मानना था कि “सशस्त्र शांति ही स्थायी शांति होती है।” उन्होंने विज्ञान-निष्ठ दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया और अंधविश्वासों को त्यागने का आह्वान किया।
विनायक दामोदर सावरकर का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रवाद कोई सुलभ मार्ग नहीं, बल्कि काँटों भरी राह है। उन्होंने अपनी जवानी के 10 सबसे कीमती वर्ष अंडमान की उस नरक जैसी कोठरी में देश के लिए होम कर दिए। आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो सावरकर का वह मंत्र हमेशा याद रखना चाहिए: “अनादि मैं, अनंत मैं, अवध्य मैं भला”—अर्थात विचार कभी नहीं मरते।
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