ढाका. बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और हाल ही में हुई हत्याओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण के बाद से हिंदू समुदाय पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। जनवरी 2026 के शुरुआती पखवाड़े में ही कई हिंदू युवकों की निर्मम हत्या ने सुरक्षा व्यवस्था और अंतरिम सरकार की मंशा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
1. हालिया घटनाक्रम: हत्याओं का सिलसिला
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समीर कुमार दास (फेनी जिला): 11 जनवरी 2026 को 28 वर्षीय ऑटो चालक समीर दास की बेरहमी से हत्या कर दी गई। हमलावर उनका वाहन लेकर फरार हो गए, जिसे पुलिस ने ‘सुनियोजित हत्या’ करार दिया है।
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राणा प्रताप बैरागी (जसोर): 5 जनवरी 2026 को जसोर जिले में हिंदू व्यवसायी और पत्रकार राणा प्रताप बैरागी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई।
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रिपन साहा (राजबाड़ी): 16 जनवरी 2026 को एक पेट्रोल पंप कर्मी रिपन साहा को दबंगों ने गाड़ी से कुचल दिया जब उन्होंने ईंधन के पैसे मांगे। आरोपियों में स्थानीय राजनीतिक दलों से जुड़े लोग शामिल बताए जा रहे हैं।
2. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट
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RRAG की चौंकाने वाली रिपोर्ट: ‘राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप’ (RRAG) के अनुसार, 1 दिसंबर 2025 से 15 जनवरी 2026 के बीच कम से कम 15 हिंदुओं की हत्या की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये हत्याएं अक्सर “तालिबानी शैली” (गला रेतकर) में की गई हैं।
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UK पार्लियामेंट में गूँज: ब्रिटेन के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने हाउस ऑफ कॉमन्स में बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति को “विनाशकारी” बताते हुए अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है।
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यूरोपीय संघ (EU) की चिंता: फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों से पहले EU ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनकी चुनाव में भागीदारी पर चिंता व्यक्त की है।
3. अंतरिम सरकार का रुख और ‘डिस्कॉर्स’
मुख्य सलाहकार डॉ. मोहम्मद युनूस की सरकार ने अक्सर इन हमलों को “सांप्रदायिक” मानने के बजाय “राजनीतिक” या “भ्रामक प्रचार” (disinformation) बताकर खारिज किया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार द्वारा हमलों को नकारना कट्टरपंथियों को और अधिक बढ़ावा दे रहा है।
4. निष्कर्ष: क्या है भविष्य?
आगामी 12 फरवरी 2026 के आम चुनावों से पहले बांग्लादेश में ‘असममित नागरिकता’ (Asymmetric Citizenship) का खतरा बढ़ गया है, जहाँ कागजों पर समान अधिकार होने के बावजूद हिंदू समुदाय डर के साये में जीने को मजबूर है। यदि समय रहते कठोर कानूनी कदम नहीं उठाए गए, तो यह पलायन की एक नई लहर को जन्म दे सकता है।
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