नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की आंशिक नाकेबंदी ने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति की ताजा रिपोर्ट ने देश की ‘ऊर्जा ढाल’ यानी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) की सुस्त रफ्तार पर खतरे की घंटी बजा दी है। जहां दुनिया 90 दिनों के बैकअप की बात कर रही है, वहीं भारत अभी भी पुराने लक्ष्यों को पाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
📉 आंकड़ों का खेल: क्यों असुरक्षित है भारत?
संसदीय समिति ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए भारत के पास कम से कम 90 दिनों की खपत के बराबर तेल भंडार होना अनिवार्य है। लेकिन मार्च 2026 की स्थिति कुछ और ही बयां करती है:
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रणनीतिक भंडार (SPR): केवल 9.5 दिन (जो क्षमता का लगभग 80% ही भरा है)।
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तेल कंपनियों का स्टॉक: लगभग 64.5 दिन।
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कुल सुरक्षा कवच: 74 दिन।
चिंता का विषय: हम अभी भी अंतर्राष्ट्रीय मानक (90 दिन) से 16 दिन पीछे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद होता है, तो भारत की GDP में 1% तक की गिरावट आ सकती है।
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🏗️ फेज-2 परियोजनाओं में ‘पॉलिसी पैरालिसिस’?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 2021 में फेज-2 के तहत दो विशाल भंडारों को मंजूरी दी गई थी, लेकिन 5 साल बाद भी जमीनी हकीकत निराशाजनक है:
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चांदीखोल (ओडिशा): 40 लाख मीट्रिक टन की प्रस्तावित क्षमता, अभी भी भूमि अधिग्रहण के फेर में फंसी है।
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पाडुर (कर्नाटक – फेज 2): 25 लाख मीट्रिक टन की क्षमता, PPP मॉडल पर काम शुरू होने का इंतजार।
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नए प्रस्ताव: बीकानेर (राजस्थान) में सॉल्ट कैवर्न (नमक की गुफाओं) और मध्य प्रदेश के बीना में नए भंडार बनाने पर विचार चल रहा है, लेकिन ये अभी कागजों पर ही हैं।
विश्लेषण: होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट: वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
💰 बजट में भारी कटौती: प्राथमिकता पर सवाल?
समिति ने बजट आवंटन और वास्तविक खर्च के बीच के “पाताल” जितने अंतर पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आंकड़ों के अनुसार, सरकार इस रणनीतिक क्षेत्र से अपना हाथ खींचती नजर आ रही है:
| वित्त वर्ष | आवंटित बजट (करोड़) | संशोधित बजट (करोड़) | वास्तविक खर्च |
| 2023-24 | ₹508 | ₹40 | शून्य (0) |
| 2024-25 | ₹408 | ₹30 | ₹17.25 करोड़ |
| 2025-26 | ₹100 | ₹20 | ₹14.54 करोड़ |
| 2026-27 | सिर्फ ₹20 करोड़ | – | – |
समिति का तंज: “जब पश्चिम एशिया जल रहा है और कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार जाने को बेताब हैं, तब बजट में यह कटौती समझ से परे है।”
योजना: राजस्थान के बीकानेर में सॉल्ट कैवर्न प्रोजेक्ट: कितनी बदली तस्वीर?
🌍 पश्चिम एशिया संकट: भारत का ‘इंडिया फर्स्ट’ रुख
मार्च 2026 में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने सदस्य देशों से वैश्विक तेल कीमतें घटाने के लिए अपने भंडार से तेल बाजार में छोड़ने की अपील की थी। लेकिन भारत ने साफ इनकार कर दिया है।
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भारत का तर्क: हमारे पास मौजूद 9.5 दिनों का भंडार केवल घरेलू आपातकाल (Supply Disruption) के लिए है, न कि वैश्विक कीमतों को नियंत्रित करने के लिए।
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विकल्प की तलाश: भारत अब रूस से आने वाले तेल के लिए विशेष ’30-दिवसीय छूट’ (Waiver) का उपयोग कर रहा है और 40 से अधिक देशों से तेल आयात कर जोखिम कम करने की कोशिश कर रहा है।
⚠️ समिति की 5 कड़े सुझाव
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बजट का सच: कागजी बजट के बजाय यथार्थवादी और जरूरत आधारित फंड दिया जाए।
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PPP मॉडल की समीक्षा: निजी क्षेत्र की भागीदारी में आ रही देरी को दूर करने के लिए नीतियों में बदलाव हो।
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सॉल्ट कैवर्न तकनीक: राजस्थान जैसे क्षेत्रों में सॉल्ट कैवर्न (नमक की गुफाएं) बनाने पर तेजी से काम हो क्योंकि ये चट्टानी गुफाओं से सस्ती और तेज बनती हैं।
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डेडलाइन तय हो: फेज-2 की परियोजनाओं के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’ डेडलाइन निर्धारित की जाए।
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वाणिज्यिक उपयोग: विदेशी कंपनियों (जैसे UAE की ADNOC) को भंडार किराये पर देकर राजस्व बढ़ाने पर जोर दिया जाए।
🧾 निष्कर्ष
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, लेकिन इसकी ‘ऊर्जा सुरक्षा’ की दीवार अभी भी कच्ची है। यदि फेज-2 परियोजनाओं में तेजी नहीं आई, तो वैश्विक संकट के समय भारत की अर्थव्यवस्था को संभालना मुश्किल हो सकता है।
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