कोलकाता । बुधवार, 20 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने और सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अंदरूनी मुश्किलें हर बीतते दिन के साथ गहराती जा रही हैं। चुनावी नतीजों के बाद राज्य की नई भाजपा सरकार के खिलाफ कोलकाता में आयोजित पार्टी का पहला बड़ा शक्ति प्रदर्शन ही अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है।
विधानसभा परिसर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के सामने आयोजित इस धरने में पार्टी के नवनिर्वाचित 80 विधायकों में से 46 विधायक नदारद रहे, जिसने टीएमसी की अंदरूनी एकजुटता की पोल खोलकर रख दी है।
सिर्फ आधा घंटा चला ‘शक्ति प्रदर्शन’, कुणाल घोष ने दी सफाई
नतीजों के बाद राज्यभर में हो रही कथित राजनीतिक हिंसा, नई सरकार की बुलडोजर कार्रवाई और रेलवे स्टेशनों के आसपास से फेरीवालों को हटाने के विरोध में यह धरना आयोजित किया गया था। उम्मीद थी कि मुख्य विपक्षी दल के रूप में टीएमसी पूरी ताकत दिखाएगी, लेकिन धरना स्थल पर केवल 34 विधायक ही पहुंचे। शुरुआत में यह संख्या महज 31 थी, जो बाद में बढ़कर 34 हुई। विधायकों की इस उदासीनता के कारण जो धरना घंटों चलना था, वह महज आधे घंटे में ही समेटना पड़ा।
पार्टी के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम और प्रवक्ता कुणाल घोष इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे। विधायकों की इतनी भारी अनुपस्थिति पर डैमेज कंट्रोल करते हुए कुणाल घोष ने सफाई दी:
“राज्य के कई इलाकों में हमारे कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, इसलिए अधिकांश विधायक अपने क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था और स्थिति संभालने में व्यस्त हैं। इसके अलावा पार्टी की ‘फैक्ट फाइंडिंग टीमें’ भी जिलों के दौरे पर हैं, जिसके कारण कई साथी कोलकाता नहीं पहुंच सके।”
अंदरूनी खींचतान: ‘अभिषेक बनर्जी’ के नारों की अनुपस्थिति ने चौंकाया
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा धरना स्थल पर लगे नारों को लेकर हो रही है। पूरे प्रदर्शन के दौरान ‘ममता बनर्जी जिंदाबाद’ और ‘तृणमूल कांग्रेस जिंदाबाद’ के नारे तो गूंजते रहे, लेकिन पार्टी के युवा चेहरे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के समर्थन में एक भी नारा सुनाई नहीं दिया।
सत्ता जाने के बाद इसे पार्टी के भीतर चल रही लीडरशिप की खींचतान और बदलते समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि इससे ठीक एक दिन पहले ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर हुई महत्वपूर्ण बैठक से भी 15 विधायक गायब थे, जो इस दरार को और पुख्ता करता है।
विश्लेषकों का दावा: केंद्रीय एजेंसियों और पुलिस कार्रवाई का खौफ
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायकों की अनुपस्थिति की वजह सिर्फ ‘क्षेत्रीय व्यस्तता’ नहीं है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही तृणमूल के कई कद्दावर नेताओं के खिलाफ पूर्व में दर्ज वसूली, सिंडिकेट राज, सिंडिकेट भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में पुलिस तथा केंद्रीय जांच एजेंसियों ने कार्रवाई बेहद तेज कर दी है।
हाल के दिनों में हुई पूछताछ और कुछ नेताओं की गिरफ्तारी ने विधायकों के भीतर एक अज्ञात डर और बेचैनी पैदा कर दी है। कई नेता खुद को फिलहाल लाइमलाइट से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे नई सरकार की सीधी रडार पर न आएं।
Matribhumisamachar


