कोलकाता । शुक्रवार, 22 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर की राजनीतिक जमीनी हकीकत तेजी से बदल रही है। एक तरफ जहां पार्टी चुनाव के नतीजों से उबरने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सांगठनिक स्तर पर असंतोष की ज्वाला भड़क उठी है। ताजा और सबसे बड़ा झटका उत्तर 24 परगना जिले से आया है, जहां हलिशहर नगरपालिका के 16 पार्षदों ने सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है।
इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति के साथ-साथ टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या है पार्षदों की नाराजगी की असली वजह?
मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफा देने वाले पार्षदों का गुस्सा किसी विपक्षी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के शीर्ष और स्थानीय नेतृत्व के खिलाफ है। पार्षदों का सीधा आरोप है कि:
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संवादहीनता (Communication Gap): चुनाव में हार का सामना करने के बाद से ही इलाके के बड़े नेताओं ने जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों से पूरी तरह दूरी बना ली है।
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सांसद पर आरोप: नाराज नेताओं ने स्थानीय सांसद पार्थ भौमिक का नाम लेते हुए कहा कि संकट और हार के इस दौर में किसी भी वरिष्ठ नेता ने उनसे संपर्क करने या उनका हौसला बढ़ाने की जहमत नहीं उठाई।
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उपेक्षा की भावना: जमीनी स्तर पर दिन-रात काम करने वाले जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को ऐसा महसूस हो रहा है कि उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।
महत्वपूर्ण तथ्य: इस्तीफा देने वाले इन 16 पार्षदों में 5 महिला पार्षद भी शामिल हैं, जो यह दर्शाता है कि यह नाराजगी केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि गहराई से जुड़ा हुआ एक भावनात्मक और राजनीतिक विद्रोह है।
कंचरपारा तक पहुंच सकती है असंतोष की आंच
राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं की मानें तो यह असंतोष सिर्फ हलिशहर नगरपालिका तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। पड़ोसी कंचरपारा नगरपालिका क्षेत्र में भी इसी तरह की अंदरूनी कलह और पार्षदों के बीच नाराजगी की खबरें तेज हैं। अगर वहां भी ऐसा ही कोई कदम उठाया जाता है, तो जिला स्तर पर टीएमसी के लिए स्थिति को संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम पर हलिशहर नगरपालिका के अध्यक्ष शुभांकर घोष ने फिलहाल पूरी तरह से दूरी बना रखी है और कोई भी आधिकारिक बयान देने से बच रहे हैं।
क्या वाकई पार्टी के अंदर सब ठीक नहीं है?
इस राजनीतिक ड्रामे का एक और बड़ा पहलू हाल ही में कोलकाता में देखने को मिला। चुनाव में मिली हार के बाद टीएमसी ने एक बड़े विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था। उम्मीद थी कि पार्टी के सभी नेता और विधायक एकजुटता दिखाएंगे, लेकिन हकीकत कुछ और ही रही:
| कुल टीएमसी विधायक | प्रदर्शन में पहुंचे विधायक | अनुपस्थित विधायक |
| 80 | 35 | 45 |
80 में से आधे से भी कम (सिर्फ 35) विधायकों का विरोध प्रदर्शन में पहुंचना इस बात का साफ अंदेशा देता है कि हार के बाद विधायकों के भीतर भी कहीं न कहीं असंतोष या असमंजस की स्थिति है।
पार्टी नेतृत्व का बचाव और सुधार की कोशिश
इस बीच बीजापुर की विधायक सुदीप्ता दास ने स्थानीय जनता को आश्वस्त करते हुए कहा है, “इस राजनीतिक उठापटक का असर आम जनता के रोजमर्रा के नागरिक कामकाज पर नहीं पड़ने दिया जाएगा। नगरपालिका की सभी आवश्यक सेवाएं पहले की तरह सुचारू रूप से चलती रहेंगी।”
वहीं दूसरी ओर, टीएमसी के वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने पार्टी में किसी भी तरह की ‘बगावत’ या ‘टूट’ की खबरों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि कई विधायक अपने सांगठनिक दायित्वों, दूर-दराज के क्षेत्रों में व्यस्त होने या निजी कारणों से प्रदर्शन में शामिल नहीं हो पाए थे।
निष्कर्ष
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी चुनाव में उम्मीद के विपरीत परिणाम आने के बाद राज्य स्तर के दलों में इस तरह का ‘आफ्टरशॉक’ (झटका) आना स्वाभाविक है। टीएमसी के सामने इस समय दो मुख्य चुनौतियाँ हैं:
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जमीनी कार्यकर्ताओं का विश्वास बहाल करना: बड़े नेताओं को वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर हार की जिम्मेदारी साझा करनी होगी।
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सख्त अनुशासन: सांगठनिक फेरबदल के जरिए संवादहीनता को दूर करना होगा, वरना आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
Matribhumisamachar


