रविवार, जनवरी 25 2026 | 10:11:40 AM
Breaking News
Home / राष्ट्रीय / त्रिपुरी अधिवेशन 1939: जब गांधीजी की ‘हार’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफे पर मजबूर किया

त्रिपुरी अधिवेशन 1939: जब गांधीजी की ‘हार’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफे पर मजबूर किया

Follow us on:

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ऐतिहासिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का त्यागपत्र और फॉरवर्ड ब्लॉक का प्रतीक।

यह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय है। 1939 का त्रिपुरी अधिवेशन (Tripuri Session) वह मोड़ था जहां ‘अहिंसा’ और ‘सशस्त्र क्रांति’ की विचारधाराएं आमने-सामने थीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1939 का वर्ष वैचारिक युद्ध का वर्ष था। एक ओर महात्मा गांधी की अहिंसक और क्रमिक सुधार की नीति थी, तो दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस का वह राष्ट्रवाद था जो द्वितीय विश्व युद्ध की आहट के बीच अंग्रेजों पर निर्णायक प्रहार करना चाहता था।

1. हरिपुरा से त्रिपुरी: संघर्ष की शुरुआत

1938 के हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे। लेकिन 1939 में जब उन्होंने दोबारा अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई, तो गांधीजी इसके पक्ष में नहीं थे। गांधीजी का मानना था कि कांग्रेस का अध्यक्ष हर साल बदलना चाहिए, जबकि सुभाष बाबू का तर्क था कि विश्व युद्ध के मंडराते बादलों के बीच देश को एक दृढ़ और निरंतर नेतृत्व की आवश्यकता है।

2. वह ऐतिहासिक चुनाव: सुभाष बनाम पट्टाभी

गांधीजी ने नेताजी के खिलाफ पट्टाभी सीतारमैया को अपना उम्मीदवार घोषित किया। यह चुनाव केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं के बीच था।

  • चुनाव परिणाम: सुभाष चंद्र बोस को 1580 वोट मिले, जबकि सीतारमैया को 1377।

  • गांधीजी की प्रतिक्रिया: हार के बाद गांधीजी ने प्रसिद्ध बयान दिया— “पट्टाभी की हार मेरी हार है।” इस एक वाक्य ने कांग्रेस के भीतर एक भावनात्मक और राजनीतिक भूचाल ला दिया।

3. राजनीतिक महत्वाकांक्षा या वैचारिक मतभेद?

इतिहासकार इस इस्तीफे के पीछे कई प्रमुख कारण मानते हैं:

  • वर्किंग कमेटी का असहयोग: गांधीजी के प्रभाव में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के 15 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सुभाष बाबू अध्यक्ष तो थे, लेकिन उनके पास काम करने के लिए टीम नहीं बची थी।

  • पंत प्रस्ताव (Pant Resolution): गोविंद वल्लभ पंत ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि अध्यक्ष को अपनी कमेटी ‘गांधीजी की इच्छा’ के अनुसार बनानी होगी। इसने नेताजी की शक्तियों को पूरी तरह सीमित कर दिया।

  • विश्व युद्ध पर नजरिया: नेताजी चाहते थे कि भारत अंग्रेजों को 6 महीने का अल्टीमेटम दे और फिर राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़े। गांधीजी उस समय अंग्रेजों को मुश्किल में डालकर फायदा उठाने के पक्ष में नहीं थे।

4. इस्तीफा और फॉरवर्ड ब्लॉक का जन्म

जब नेताजी को लगा कि गांधीजी के समर्थन के बिना वे कांग्रेस को अपनी योजना के अनुसार नहीं चला पाएंगे, तो उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया।

कांग्रेस छोड़ने के बाद, उन्होंने उसी वर्ष ‘ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की ताकि वे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा को आगे बढ़ा सकें।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

सांप के जहर की दवा (ASV) के इंजेक्शन

सांप के जहर की दवाओं के साइड इफेक्ट्स पर नई रिसर्च: क्या एंटी-वेनम अब खतरनाक है?

नई दिल्ली. सांप के काटने पर दी जाने वाली एंटी-स्नेक वेनम (ASV) दवाओं के दुष्प्रभावों …