मुंबई । मंगलवार, 23 जून 2026
ग्लोबल बासमती चावल के कारोबार में पिछले कुछ महीनों से मची हलचल अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। महीनों के गतिरोध और सुरक्षा चिंताओं के बाद जून 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से समुद्री जहाजों का आवागमन एक बार फिर पूरी तरह सामान्य होने लगा है। वैश्विक व्यापार के लिए यह भले ही एक राहत भरी खबर हो, लेकिन भारत के बासमती चावल निर्यातकों और कारोबारियों की धड़कनें तेज हो गई हैं।
भारतीय निर्यातकों को डर है कि इस रणनीतिक समुद्री रास्ते के खुलते ही पड़ोसी देश पाकिस्तान अपनी आक्रामक और भारी सब्सिडी वाली नीतियों के दम पर मध्य पूर्व (Middle East) के देशों में भारत के मजबूत मार्केट शेयर में सेंध लगा सकता है।
मध्य पूर्व: बासमती चावल का सबसे बड़ा अखाड़ा
बासमती चावल दशकों से भारत और पाकिस्तान के बीच न सिर्फ सांस्कृतिक बल्कि एक बड़ा व्यापारिक मुकाबला रहा है। पूरी दुनिया में आयात होने वाले बासमती चावल की सबसे ज्यादा खपत मध्य पूर्व के देशों में होती है, और यही दोनों देशों का मुख्य बाजार है।
-
भारत के शीर्ष 3 बाजार: सऊदी अरब, ईरान और इराक।
-
पाकिस्तान के शीर्ष 3 बाजार: संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और ईरान।
सऊदी अरब और ईरान जैसे बड़े बाजारों में दोनों देश सीधे एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। UAE के सुपरमार्केट्स में भी यह जंग साफ देखी जा सकती है, जहां भारत के प्रतिष्ठित ब्रांड जैसे ‘इंडिया गेट’ और ‘दावत’ के ठीक बगल वाले शेल्फ पर पाकिस्तान का ‘कायनात 1121’ चावल का पैकेट (जिस पर जिराफ का क्लोज-अप शॉट होता है) आसानी से मिल जाता है।
‘कायनात’ की हकीकत: भारतीय शोध की नकल
इस व्यापारिक मुकाबले में सबसे दिलचस्प और कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान जिस ‘कायनात’ चावल के दम पर खाड़ी देशों में अपनी पैठ बना रहा है, वह मूल रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत का नतीजा है। भारत के मशहूर कृषि वैज्ञानिक विजय पाल सिंह ने दो दशकों से अधिक की कड़ी रिसर्च के बाद बासमती की ‘1121 किस्म’ (1121 Basmati Variety) को विकसित किया था।
अपनी लंबी और खुशबूदार बनावट के कारण इस किस्म ने दुनिया भर के चावल बाजार को बदल कर रख दिया और आज भी यह भारत को सालाना लगभग 25,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा कमा कर देती है। पाकिस्तान इसी भारतीय किस्म की नकल कर ‘कायनात 1121’ के नाम से इसे ग्लोबल मार्केट में बेचता है।
पाकिस्तानी ‘ड्यूटी ड्रॉबैक स्कीम’ (DLTL) से क्यों डरे हैं भारतीय कारोबारी?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती चावल अपनी प्रीमियम क्वालिटी के कारण हमेशा से ऊंची कीमतों पर बिकता आया है। लेकिन इस साल जनवरी में पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय (Commerce Ministry) ने एक बड़ा कार्ड खेला, जिसने भारतीय व्यापारियों की नींद उड़ा दी है।
पाकिस्तान ने चावल निर्यात को बढ़ावा देने के लिए ‘लोकल टैक्स और लेवी पर ड्रॉबैक’ (DLTL) योजना की शुरुआत की है। इस स्कीम के तहत:
-
9% का भारी रिफंड: जो पाकिस्तानी निर्यातक 750 डॉलर प्रति टन या उससे अधिक कीमत पर बासमती बेच रहे हैं, उन्हें कुल निर्यात मूल्य का 9% ड्यूटी ड्रॉबैक (टैक्स रिफंड) के रूप में वापस मिल रहा है।
-
3% का रिफंड: कम कीमत वाले बासमती चावल के शिपमेंट पर भी 3% का वित्तीय लाभ दिया जा रहा है।
द हिंदू बिजनेसलाइन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय निर्यातकों को सबसे बड़ा डर यह है कि इस सरकारी सब्सिडी के सहारे पाकिस्तानी निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद कम कीमतों पर बासमती की पेशकश कर रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट के पूरी तरह चालू होने के बाद, पाकिस्तान की यह कम कीमत वैश्विक स्तर पर एक ‘नया बेंचमार्क’ बन सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय खरीदार भारतीय निर्यातकों से भी कीमतें घटाने का दबाव बनाएंगे, जिससे भारतीय कारोबारियों का मुनाफा बुरी तरह प्रभावित होगा।
वैश्विक बाजार में भारत का दबदबा बरकरार, पर सतर्कता जरूरी
हालांकि, आंकड़ों के लिहाज से भारत आज भी बासमती चावल के वैश्विक निर्यात में एकछत्र साम्राज्य रखता है। दुनिया के कुल बासमती व्यापार का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत से जाता है। पाकिस्तान इस सुगंधित अनाज का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक तो है, लेकिन मात्रा के मामले में वह अभी भी भारत से काफी पीछे है। भारत में भी बासमती के निर्यात में लगातार तेजी देखी जा रही है, जो भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा सहारा है।
कृषि और निर्यात परिदृश्य पर विशेष इनसाइट: उत्तर भारत में बासमती चावल की खेती नकदी फसलों (Cash Crops) में सबसे अधिक मुनाफे वाली मानी जाती है। भारत ने आधुनिक कृषि तकनीकों और बेहतर एक्सपोर्ट चेन के दम पर इस बाजार को संभाला है। इस संबंध में और अधिक जानने के लिए आप Top 5 Profitable Cash Crops for North India in 2026: Maximizing पर विस्तृत विश्लेषण पढ़ सकते हैं।
आगे की राह: क्या भारत को भी देनी होगी सब्सिडी?
होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते जहाजों की आवाजाही सामान्य होने के बाद आने वाले कुछ महीने भारतीय चावल उद्योग के लिए परीक्षा की घड़ी होंगे। यदि पाकिस्तानी ‘राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन’ अपनी कम कीमतों के दम पर मध्य पूर्व के सऊदी अरब और ईरान जैसे पारंपरिक भारतीय गढ़ों में सेंध लगाने में कामयाब रहता है, तो भारतीय वाणिज्य मंत्रालय को भी घरेलू निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए इंसेंटिव या टैक्स रिफंड जैसी किसी बड़ी नीति पर विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल, भारतीय व्यापारियों की नजरें खाड़ी देशों की मंडियों और वहां से आने वाले नए ऑर्डर्स पर टिकी हुई हैं।
Matribhumisamachar


