मुंबई. साल 1997 में जब जे.पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ रिलीज हुई थी, तब उसने न केवल बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोड़े थे, बल्कि हर भारतीय के भीतर देशभक्ति का एक नया ज्वार पैदा किया था। अब करीब तीन दशक बाद, सनी देओल ‘बॉर्डर 2’ के साथ वापस आ रहे हैं। लेकिन फिल्म के रिलीज होने से पहले ही खाड़ी देशों (Gulf Countries) से आई ‘बैन’ की खबरों ने एक नई बहस छेड़ दी है: क्या सिनेमाई देशभक्ति अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की बलि चढ़ रही है?
1. विवाद की जड़: आखिर बैन क्यों?
खाड़ी देशों (जैसे कुवैत, कतर और यूएई) के सेंसर बोर्ड अक्सर उन फिल्मों पर कैंची चलाते हैं जो किसी विशेष समुदाय या देश के प्रति ‘आक्रामक’ रुख दिखाती हैं। सूत्रों की मानें तो ‘बॉर्डर 2’ में दिखाए गए कुछ हाई-वोल्टेज युद्ध दृश्यों और डायलॉग्स को लेकर आपत्ति जताई गई है।
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चिंता का विषय: क्या फिल्म केवल युद्ध की कहानी है, या यह किसी खास विचारधारा को हवा दे रही है? खाड़ी देशों का तर्क है कि ऐसी फिल्में उनके क्षेत्र में रहने वाले प्रवासियों के बीच तनाव पैदा कर सकती हैं।
2. सनी देओल और ‘हैंडपंप’ वाली छवि
सनी देओल की फिल्मों में ‘पाकिस्तान विरोधी’ तेवर उनके करियर का ट्रेडमार्क रहे हैं। ‘गदर 2’ की अपार सफलता ने यह साबित किया कि भारतीय दर्शक आज भी पर्दे पर ‘दुश्मन को धूल चटाते’ नायक को देखना पसंद करते हैं। लेकिन जो मसाला घरेलू दर्शकों के लिए ‘राष्ट्रवाद’ है, वही अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए ‘विवादास्पद’ बन जाता है।
3. देशभक्ति बनाम कूटनीति: एक जटिल संतुलन
आज का भारत 1997 वाला भारत नहीं है। आज खाड़ी देशों के साथ हमारे संबंध रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत हैं।
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आर्थिक पहलू: गल्फ देशों में बॉलीवुड का बहुत बड़ा बाजार है। फिल्म बैन होने से करोड़ों का नुकसान तय है।
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सांस्कृतिक प्रभाव: क्या एक फिल्म दो देशों के बीच के रिश्तों में कड़वाहट ला सकती है? विशेषज्ञों का मानना है कि सिनेमा को ‘कला’ के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि ‘प्रोपेगेंडा’ के रूप में।
4. अभिव्यक्ति की आजादी या जिम्मेदारी?
फिल्म निर्माताओं का तर्क है कि ‘बॉर्डर 2’ वास्तविक घटनाओं (बैटल ऑफ लोंगेवाला के बाद के घटनाक्रम) पर आधारित है। यदि इतिहास को पर्दे पर उतारना ‘विवादास्पद’ है, तो ऐतिहासिक फिल्मों का भविष्य क्या होगा? दूसरी तरफ, सेंसरशिप का तर्क है कि वैश्विक शांति के लिए ‘सॉफ्ट पावर’ (सिनेमा) का इस्तेमाल नफरत के बजाय सद्भाव फैलाने के लिए होना चाहिए।
‘बॉर्डर 2’ पर प्रतिबंध केवल एक फिल्म का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति का आईना है। एक तरफ हमारे वीर जवानों की शौर्य गाथा है जिसे देखना हर भारतीय का हक है, और दूसरी तरफ वैश्विक मंच पर भारत की ‘शांतिदूत’ की छवि। यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म मेकर्स बीच का रास्ता कैसे निकालते हैं—क्या वे दृश्यों में बदलाव करेंगे, या ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर इस विवाद को फिल्म की पब्लिसिटी का हिस्सा बनाएंगे?
“युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, अब सिनेमा के पर्दों और सेंसर बोर्ड के दफ्तरों में भी लड़ा जा रहा है।”
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