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1993 कोलकाता बहूबाजार ब्लास्ट: मुख्य दोषी राशिद खान की समय पूर्व रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक, कहा- ‘यह लगभग आतंकी गतिविधि थी’

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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया नई दिल्ली की इमारत जहाँ 1993 के कोलकाता बहूबाजार बम विस्फोट मामले की सुनवाई हुई।

कोलकाता, बुधवार, 24 जून 2026

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साल 1993 के बहुचर्चित कोलकाता बहूबाजार बम विस्फोट कांड (1993 Kolkata Bowbazar Bomb Blast Case) के मुख्य दोषी मोहम्मद राशिद खान की समय पूर्व रिहाई पर अंतरिम रोक (Interim Stay) लगा दी है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने मानवीय आधार और सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) को देखते हुए 77 वर्षीय राशिद खान को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था, जिसे पश्चिम बंगाल सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी।

न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने राशिद खान को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई अब 28 जुलाई, 2026 को तय की गई है।

क्या था 1993 का कोलकाता बहूबाजार बम विस्फोट कांड?

यह घटना 16 मार्च 1993 की रात को कोलकाता के घनी आबादी वाले बहूबाजार इलाके में हुई थी। यह धमाका मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों (12 मार्च 1993) के ठीक चार दिन बाद हुआ था।

  • तबाही का मंजर: सट्टा कारोबारी और स्थानीय डॉन राशिद खान के ठिकाने पर अवैध रूप से भारी मात्रा में विस्फोटक जमा किया गया था। इस बारूद में अचानक हुए भीषण विस्फोट के कारण दो रिहायशी इमारतें पूरी तरह जमींदोज हो गईं।

  • जान-माल का नुकसान: मलबे में दबने और धमाके की चपेट में आने से 69 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 100 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

  • सजा: राशिद खान को मार्च 1993 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। साल 2001 में विशेष टाडा (TADA) कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC), विस्फोटक अधिनियम और टाडा कानून के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने किस आधार पर दिया था रिहाई का आदेश?

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने 5 जून, 2026 को राशिद खान की याचिका को स्वीकार करते हुए उसकी तत्काल रिहाई का निर्देश दिया था। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:

  1. लंबी जेल अवधि: याचिकाकर्ता पिछले 33 वर्षों से अधिक समय से जेल की सजा काट चुका है।

  2. उम्र और खराब स्वास्थ्य: राशिद खान की उम्र 77 वर्ष हो चुकी है और वह मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (Hypertension) और मोतियाबिंद (Cataract) जैसी कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित है।

  3. जेल में अच्छा आचरण: जेल रिकॉर्ड के अनुसार उसका आचरण ‘बेहद अच्छा’ रहा है और वह पैरोल अवधि के दौरान कभी भी नियमों का उल्लंघन नहीं किया।

  4. सुधारात्मक सिद्धांत: हाई कोर्ट ने कहा कि दंड का मुख्य उद्देश्य प्रतिशोध (Retribution) के बजाय सुधार (Reformation) होना चाहिए। इतनी लंबी कैद के बाद उसे जेल में रखने का कोई औचित्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की दलीलें और अदालत की सख्त टिप्पणी

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि राज्य के ‘सेंटेंस रिव्यू बोर्ड’ (SSRB) ने राशिद की रिहाई की सिफारिश को बार-बार खारिज किया था क्योंकि यह कोई सामान्य अपराध नहीं, बल्कि समाज पर गहरा प्रभाव डालने वाला एक जघन्य कृत्य था।

जब राशिद खान के वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को सीधे तौर पर हत्या का दोषी नहीं माना गया था और सह-अभियुक्त पन्नालाल जायसवाल को भी 2014 में रिहाई (Remission) मिल चुकी है, तो सुप्रीम कोर्ट की पीठ सहमत नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी:

“यह लगभग एक आतंकवादी गतिविधि जैसी घटना थी। सह-अभियुक्त और मुख्य साजिशकर्ता की भूमिका में अंतर होता है। इस पूरे मामले में राशिद खान की भूमिका ‘मास्टरमाइंड’ की थी। भले ही वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो, लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से सक्रिय (Fully Functional) है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस स्तर पर हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक नहीं लगाई गई, तो राज्य सरकार की यह विशेष अनुमति याचिका (SLP) निष्प्रभावी या अर्थहीन हो जाएगी।

महत्वपूर्ण तथ्य 

  • तथ्य सुधार 1 (मृतकों की संख्या): कुछ शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स और बहसों में मृतकों की संख्या 70 बताई गई थी, लेकिन आधिकारिक अदालती रिकॉर्ड के अनुसार इस घटना में कुल 69 लोगों की जान गई थी।

  • तथ्य सुधार 2 (सुनवाई की तारीख): इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने 18 जून को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया गया था, जिसके बाद इसकी विस्तृत अंतरिम सुनवाई 23 जून, 2026 को पूरी की गई।

न्यायालय के इस रुख से साफ है कि जघन्य आतंकी या टाडा मामलों में केवल लंबी जेल अवधि या जेल के अच्छे आचरण के आधार पर सुधारात्मक नीति को लागू करना आसान नहीं होगा, विशेषकर तब जब अपराधी घटना का मुख्य सूत्रधार रहा हो।

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