शाहपुरा । गुरुवार, 2 जुलाई 2026
राजस्थान के नवनिर्मित शाहपुरा जिले (पूर्व में भीलवाड़ा जिला क्षेत्र) के शाहपुरा नगर में गुरुवार सुबह प्रशासन ने एक ऐतिहासिक और बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। शहर के पुराने बस स्टैंड के पास स्थित ऐतिहासिक सुल्तान शाह की बावड़ी के पास लंबे समय से काबिज विवादित अतिक्रमण पर आखिरकार नगर पालिका शाहपुरा और प्रशासनिक अमले ने संयुक्त रूप से ‘पीला पंजा’ (बुलडोजर) चलाकर ज़मीन को पूरी तरह मुक्त करा लिया है।
गुरुवार सुबह से ही प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भारी जाब्ते और पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरे। देखते ही देखते वर्षों से विवाद का केंद्र बनी इस बेशकीमती भूमि को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया। इस बड़ी कार्रवाई के दौरान पूरे शाहपुरा शहर में माहौल काफी तनावपूर्ण लेकिन पूरी तरह नियंत्रण में बना रहा।
क्या था सुल्तान शाह की बावड़ी भूमि विवाद?
शाहपुरा शहर के पुराने बस स्टैंड स्थित सुल्तान शाह की बावड़ी के आसपास की ज़मीन का यह मालिकाना हक विवाद सालों पुराना था। इस भूमि पर स्थानीय वक्फ कमेटी और नगर पालिका शाहपुरा के बीच लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही थी। वक्फ कमेटी ने इस क्षेत्र की लगभग 1 बीघा 10 बिस्वा भूमि को वक्फ संपत्ति बताते हुए इस पर अपना दावा जताया था।
यह मामला लंबे समय से राजस्थान वक्फ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन था। ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने और राजस्व रिकॉर्ड की जांच करने के बाद हाल ही में एक बड़ा फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने वक्फ कमेटी के 1 बीघा 10 बिस्वा के बड़े दावे को सिरे से खारिज कर दिया और केवल 9 गुणा 22 फीट की भूमि पर ही वक्फ कमेटी का अधिकार स्वीकार किया।
न्यायालय (ट्रिब्यूनल) के इसी ऐतिहासिक आदेश के बाद नगर पालिका शाहपुरा के लिए विवादित हिस्से से अवैध कब्जे हटाने का कानूनी रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
प्रशासन ने पहले ही जारी किया था नोटिस
प्रशासनिक नियमों का पालन करते हुए नगर पालिका ने इस सख्त कार्रवाई से पूर्व क्षेत्र में सार्वजनिक नोटिस जारी किया था। नोटिस के माध्यम से संबंधित लोगों और दुकानदारों को स्वयं ही अपना अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे। नोटिस की गंभीरता को समझते हुए कुछ स्थानीय सब्जी विक्रेताओं ने कार्रवाई से पहले ही अपने अस्थायी ढांचे और केबिन हटाने शुरू कर दिए थे।
इसके बावजूद, विवादित हिस्से पर कई पक्के व अस्थायी निर्माण, केबिनें और कथित धार्मिक ढांचे मौजूद थे। प्रशासन ने अंतिम समय तक कब्जाधारियों को मौका दिया, लेकिन जब उनकी तरफ से पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, तो गुरुवार को जेसीबी मशीनों को मैदान में उतारना पड़ा।
वक्फ कमेटी ने मांगा समय, संवेदनशीलता के साथ हुआ इंतजार
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान माहौल को शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए प्रशासन ने संवेदनशीलता भी दिखाई। जब जेसीबी मशीनों ने मोर्चा संभाला, तब वक्फ कमेटी के सदर हमीद खान अपने अधिवक्ता ताज मोहम्मद के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता की और कहा कि वे संबंधित मजारों और ढांचों को पूरे सम्मान के साथ स्वयं हटाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें थोड़ा समय दिया जाए।
शाहपुरा उपखंड अधिकारी (SDO) सुनील मीणा और पुलिस अधिकारियों ने कानून व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सहयोग का रुख अपनाया। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यदि हटाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाती है, तो वे इंतजार कर सकते हैं। इसके बाद करीब एक घंटे तक प्रशासन ने संयम बनाए रखा और बुलडोजर की कार्रवाई को रोके रखा। हालांकि, तय और निर्धारित समय के भीतर जब कमेटी की ओर से अतिक्रमण हटाने की जमीनी प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी, तो प्रशासन ने निर्णय लेते हुए जेसीबी मशीनों को आगे बढ़ाया और अवैध ढांचों को ढहा दिया।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: बीएनएस की धारा-163 लागू
शाहपुरा के सांप्रदायिक और सामाजिक ताने-बाने को देखते हुए यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील माना जा रहा था। किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना, अफवाह या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति से निपटने के लिए शाहपुरा उपखंड प्रशासन ने बुधवार शाम से ही कमर कस ली थी।
शाहपुरा उपखंड अधिकारी सुनील मीणा ने बताया:
“कस्बे में संभावित संवेदनशीलता और तनाव को देखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) की धारा-163 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा-144) के तहत तुरंत प्रभाव से निषेधाज्ञा लागू कर दी गई थी।”
प्रशासन ने साफ चेतावनी दी थी कि कानून को हाथ में लेने या शांति व्यवस्था भंग करने की कोशिश करने वाले किसी भी अराजक तत्व को बख्शा नहीं जाएगा। गुरुवार सुबह से ही पूरे सुल्तान शाह की बावड़ी क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। पूरे विवादित क्षेत्र की मजबूत लोहे की बैरिकेडिंग से घेराबंदी की गई और चप्पे-चप्पे पर भारी संख्या में पुलिस बल और आरएसी के जवान तैनात रहे।
इस कार्रवाई को केवल एक अतिक्रमण हटाने के अभियान के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र में कानून का इकबाल बुलंद करने और न्यायिक आदेशों के प्रति प्रशासन की प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है।
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