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महर्षि सुश्रुत: दुनिया के पहले सर्जन जिन्होंने 2500 साल पहले की थी प्लास्टिक सर्जरी

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महर्षि सुश्रुत द्वारा की जाने वाली प्राचीन शल्य चिकित्सा का चित्रण

प्राचीन भारत के महान चिकित्साशास्त्री महर्षि सुश्रुत को संपूर्ण विश्व में ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ (Father of Surgery) माना जाता है। लगभग 600 ईसा पूर्व, यानी आज से करीब 2,500 वर्ष पहले, उन्होंने चिकित्सा विज्ञान को जिस ऊँचाई तक पहुँचाया, वह आधुनिक युग में भी आश्चर्यजनक मानी जाती है।

उनकी अमर कृति सुश्रुत संहिता न केवल आयुर्वेद का आधार ग्रंथ है, बल्कि यह दुनिया का सबसे प्राचीन और व्यवस्थित सर्जरी ग्रंथ भी माना जाता है। इसमें शल्य क्रिया, औजार, प्रशिक्षण, एनेस्थीसिया, स्वच्छता और शरीर रचना (Anatomy) का वैज्ञानिक विवरण मिलता है।

प्लास्टिक सर्जरी के प्रथम प्रवर्तक

महर्षि सुश्रुत की सबसे बड़ी उपलब्धि राइनोप्लास्टी (नाक की सर्जरी) है। प्राचीन काल में दंड स्वरूप नाक काटे जाने पर वे गाल या माथे की त्वचा से नई नाक का निर्माण करते थे।
उन्होंने न केवल नाक, बल्कि कान (ओटोप्लास्टी) और होंठ की प्लास्टिक सर्जरी का भी विस्तृत वर्णन किया। आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के कई सिद्धांत आज भी सुश्रुत की इन्हीं विधियों पर आधारित हैं।

121 से अधिक शल्य उपकरणों का वैज्ञानिक वर्गीकरण

सुश्रुत संहिता में कुल 101 यंत्र (Blunt Instruments) और 20 शस्त्र (Sharp Instruments) का उल्लेख मिलता है।

🔹 प्रमुख यंत्र

  • सिंहमुख व व्याघ्रमुख – आधुनिक फोरसेप्स जैसे
  • शलाका यंत्रप्रोब्स की तरह
  • नाड़ी यंत्र – खोखली नलिकाएँ, नाक व कान की जांच हेतु

🔹 प्रमुख शस्त्र

  • मण्डलाग्र – फोड़े चीरने के लिए
  • करपत्र – आधुनिक आरी जैसा
  • सूची (सुई) – टांके लगाने हेतु

👉 रोचक तथ्य: सुश्रुत औजारों को आग में तपाकर कीटाणुरहित करने की सलाह देते थे, जो आज की Sterilization Technique का प्रारंभिक रूप है।

जटिल सर्जरी में महारत

🔸 मोतियाबिंद ऑपरेशन (Cataract – ‘लिंगनाश’)

सुश्रुत द्वारा विकसित ‘कौचिंग विधि’ 18वीं सदी तक दुनिया भर में प्रचलित रही। विशेष सुई से धुंधले लेंस को दृष्टि क्षेत्र से हटाया जाता था, जिससे रोगी को पुनः दिखाई देने लगता था।

🔸 अन्य प्रमुख सर्जरी

  • पथरी निकालने की प्रक्रिया (Lithotomy)
  • हड्डी जोड़ने व फ्रैक्चर उपचार
  • कठिन प्रसव में सर्जिकल हस्तक्षेप (सिजेरियन सेक्शन)

व्यवहारिक चिकित्सा शिक्षा के जनक

महर्षि सुश्रुत मानते थे कि सिर्फ शास्त्र ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवहारिक अभ्यास अनिवार्य है।

  • खीरा, लौकी, तरबूज पर चीरा अभ्यास
  • कपड़े व चमड़े पर टांके
  • कमल डंठल और मृत पशुओं की नसों पर शिरा अभ्यास

यह पद्धति आज के मेडिकल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की नींव मानी जाती है।

एनेस्थीसिया, स्वच्छता और घाव प्रबंधन

उस समय आधुनिक बेहोशी की दवाएँ नहीं थीं, फिर भी सुश्रुत—

  • मद्य और भांग से दर्द नियंत्रण
  • औषधीय धुएँ व काढ़ों से घाव की सफाई
  • ऑपरेशन के बाद विशेष आहार और विश्राम पर बल

एनाटॉमी और शव विच्छेदन की वैज्ञानिक सोच

धार्मिक प्रतिबंधों के बावजूद सुश्रुत ने शव को नदी में रखकर प्राकृतिक अपघटन विधि से शरीर की आंतरिक संरचना का अध्ययन किया। इससे नसों, मांसपेशियों और अंगों का विस्तृत ज्ञान संभव हुआ।

वैश्विक प्रभाव और विरासत

महर्षि सुश्रुत का चिकित्सा ज्ञान अरब देशों के माध्यम से यूरोप पहुँचा और आधुनिक सर्जरी के विकास की आधारशिला बना।
उनकी शल्य चिकित्सा न केवल तकनीकी रूप से उन्नत थी, बल्कि वैज्ञानिक, तर्कसंगत और मानव-केंद्रित भी थी।

महर्षि सुश्रुत यह सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारत का चिकित्सा विज्ञान अपने समय से सदियों आगे था। आज की आधुनिक सर्जरी की जड़ों में उनका अमूल्य योगदान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है—और यही कारण है कि वे आज भी विश्व चिकित्सा इतिहास में अमर हैं।

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