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सुप्रीम कोर्ट से उस्मान खान को झटका: उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश बरकरार, दुष्कर्म मामले में नहीं मिली राहत

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देहरादून | शुक्रवार, 8 मई 2026

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उत्तराखंड के चर्चित मामले में याचिकाकर्ता उस्मान खान को बड़ा कानूनी झटका दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सोमवार को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी को राहत देने से इनकार किया गया था। इस निर्णय के साथ ही अब नैनीताल हाईकोर्ट का 27 फरवरी 2026 का आदेश प्रभावी रहेगा।

सुनवाई का मुख्य घटनाक्रम

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ। याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गगन गुप्ता ने दलीलें पेश कीं, लेकिन कोर्ट ने मामले की गंभीरता और हाईकोर्ट के तथ्यों को देखते हुए हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

नया आदेश सुनाते हुए पीठ ने कहा:

“वर्तमान में उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई ठोस या उचित आधार नजर नहीं आता। अतः यह विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका के साथ दाखिल सभी लंबित आवेदन भी इसी के साथ स्वतः निस्तारित माने जाएंगे।

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी लड़ाई उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 27 फरवरी 2026 को पारित एक आदेश से शुरू हुई थी। उस्मान खान पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत गंभीर आरोप हैं।

  • आरोप: उस्मान खान पर एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म और डराने-धमकाने का आरोप है।

  • हाईकोर्ट का रुख: नैनीताल हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका या राहत की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अपराध की प्रकृति जघन्य है और पीड़िता पर दबाव बनाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

  • सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के विवेक (Discretion) को सही माना और मुकदमे के इस स्तर पर आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा SLP खारिज किए जाने के बाद अब आरोपी के पास ट्रायल का सामना करने के अलावा बहुत सीमित विकल्प बचे हैं। इस फैसले से साफ है कि गंभीर अपराधों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में अदालतें निचली अदालतों के फैसलों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करतीं, जब तक कि कोई बड़ी संवैधानिक चूक न हो।

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