नई दिल्ली. भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर, जर्मन चांसलर फ्रीड्रिश मैर्त्स की भारत यात्रा ने दोनों देशों के रक्षा और सुरक्षा संबंधों को एक ऐतिहासिक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस यात्रा के दौरान न केवल अरबों डॉलर के समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत रक्षा रोडमैप भी तैयार किया गया।
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इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण भारतीय नौसेना के लिए 6 उन्नत पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण है। लगभग 8 अरब डॉलर (70,000 करोड़ रुपये से अधिक) के इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत जर्मनी भारत को पनडुब्बी निर्माण की तकनीक का पूर्ण हस्तांतरण (Technology Transfer) करेगा। यह ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है।
सैन्य युद्धाभ्यास: समुद्र से आसमान तक साथ दिखेंगे दोनों देश
भारत और जर्मनी के बीच सैन्य समन्वय अब और गहरा होगा। चांसलर मैर्त्स ने आगामी प्रमुख अभ्यासों में जर्मन सेना की भागीदारी की पुष्टि की है:
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MILAN 2026: फरवरी में होने वाले भारत के इस सबसे बड़े बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास में जर्मनी अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा।
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तरंग शक्ति (Tarang Shakti): भारतीय वायुसेना के अंतरराष्ट्रीय युद्धाभ्यास में भी जर्मन वायुसेना के लड़ाकू विमान हिस्सा लेंगे, जो दोनों देशों के बीच बेहतर सामंजस्य को दर्शाता है।
रक्षा औद्योगिक सहयोग और सह-उत्पादन
दोनों देशों ने एक ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप’ के लिए साझा घोषणापत्र (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। अब भारत और जर्मनी केवल खरीदार-विक्रेता के रिश्ते से आगे बढ़कर रक्षा उपकरणों के सह-विकास (Co-development) और सह-उत्पादन (Co-production) पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
भारत को ‘विशेष दर्जा’ और हिंद-प्रशांत रणनीति
एक बड़े रणनीतिक बदलाव के रूप में, जर्मनी ने भारत को अपनी सैन्य खरीद सूची में ‘विशेष दर्जा’ दिया है। इससे भविष्य में हथियारों के निर्यात और तकनीकी मंजूरी की प्रक्रिया बेहद सरल और तेज हो जाएगी। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जर्मनी IFC-IOR (Information Fusion Centre–Indian Ocean Region) में अपना एक संपर्क अधिकारी तैनात करेगा।
रूस पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी के साथ यह बढ़ती नजदीकी भारत के लिए अपनी रक्षा आपूर्ति में विविधता लाने का सुनहरा अवसर है। इससे रूस जैसे पारंपरिक सहयोगियों पर भारत की निर्भरता कम होगी और रक्षा क्षेत्र में पश्चिमी तकनीक तक पहुंच आसान होगी।
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