नई दिल्ली । गुरुवार, 14 मई 2026
भारत में धान की खेती का परिदृश्य बदल रहा है। जहाँ पारंपरिक खेती में पानी और मजदूरी पर होने वाला खर्च किसानों की कमर तोड़ रहा था, वहीं अब नई वैज्ञानिक तकनीकें लागत में 20-30% तक की कमी और पैदावार में 15% तक की वृद्धि का वादा कर रही हैं।
1. सीधी बुवाई (DSR): श्रम और पानी की बड़ी बचत
पारंपरिक ‘कद्दू’ (Puddling) विधि में नर्सरी तैयार करने और रोपाई में बहुत खर्च होता है। डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक में बीज को सीधे खेत में बोया जाता है।
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लाभ: इसमें प्रति एकड़ लगभग 3,000 से 5,000 रुपये की बचत होती है और पानी की खपत 25% कम हो जाती है।
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नोट: DSR के लिए ‘लेजर लैंड लेवलर’ का उपयोग अनिवार्य है ताकि पूरे खेत में नमी समान रहे।
2. AWD तकनीक: सिंचाई प्रबंधन का नया मंत्र
लगातार खेत में पानी भरकर रखना न केवल खर्चीला है, बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरता भी घटती है। Alternate Wetting and Drying (AWD) विधि में किसान एक छिद्रित पाइप (Pani Pipe) का उपयोग करते हैं।
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जब पाइप के अंदर पानी का स्तर सतह से 15 सेमी नीचे चला जाए, तभी अगली सिंचाई करें। इससे डीजल और बिजली का खर्च भारी मात्रा में बचता है।
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3. संतुलित उर्वरक और LCC का उपयोग
किसान अक्सर यूरिया का अधिक प्रयोग करते हैं जिससे कीटों का हमला बढ़ता है। लीफ कलर चार्ट (LCC) एक सरल प्लास्टिक कार्ड है जिसकी मदद से पत्ती के रंग को देखकर नाइट्रोजन (यूरिया) की सटीक मात्रा तय की जाती है। इससे खाद की बर्बादी रुकती है।
4. एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM)
महंगे रासायनिक कीटनाशकों के बजाय फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप और ‘ट्राइकोकार्ड’ जैसे जैविक विकल्पों को अपनाएं। यह न केवल सस्ता है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है।
निष्कर्ष: धान की खेती अब केवल मेहनत का नहीं, बल्कि प्रबंधन का खेल है। यदि किसान मिट्टी परीक्षण, सही बीज और जल प्रबंधन पर ध्यान दें, तो लागत घटाकर शुद्ध लाभ को दोगुना किया जा सकता है।
अस्वीकरण
यद्यपि हमने जानकारी की सटीकता सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास किया है, फिर भी किसानों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी नई तकनीक (जैसे DSR या AWD) या कीटनाशकों/उर्वरकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग करने से पहले अपने क्षेत्र के निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि अधिकारी या विशेषज्ञ से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें।
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