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भारत की बड़ी सांस्कृतिक जीत: चोल राजवंश के ऐतिहासिक ‘अनाइमंगलम ताम्रपत्र’ 300 साल बाद नीदरलैंड से स्वदेश लौटे

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नई दिल्ली । शनिवार, 16 मई 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच देशों के महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के बीच, भारत को अपनी प्राचीन संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी एक बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। नीदरलैंड सरकार ने चोल राजवंश (Chola Dynasty) के अत्यंत कीमती और ऐतिहासिक ताम्रपत्र (तांबे की प्लेट्स) आधिकारिक तौर पर भारत को सौंप दिए हैं।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों और इतिहासकारों के बीच इन ताम्रपत्रों को ‘अनाइमंगलम कॉपर प्लेट्स’ (Anaimangalam Copper Plates) या ‘लेडन प्लेट्स’ (Leiden Plates) के नाम से जाना जाता है। ये प्लेट्स 11वीं सदी की हैं, जो पिछले 300 से अधिक सालों से नीदरलैंड की प्रतिष्ठित ‘लेडन यूनिवर्सिटी’ (Leiden University) की लाइब्रेरी में सुरक्षित रखी हुई थीं। साल 2012 से ही भारत सरकार इसे वापस लाने का लगातार प्रयास कर रही थी, जिसे अब जाकर पूर्ण सफलता मिली है।

क्यों खास हैं चोल काल के ये ताम्रपत्र? (संरचना और विशेषताएं)

ये तांबे की प्लेट्स चोल साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा राजराजा प्रथम और उनके योग्य पुत्र राजेंद्र चोल के शासनकाल की हैं। कला और वास्तुकला की दृष्टि से यह प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान का एक उत्कृष्ट नमूना हैं।

  • वजन और आकार: इन सभी ताम्रपत्रों का कुल सामूहिक वजन लगभग 30 किलोग्राम है।

  • बनावट: इसमें 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की प्लेट्स को एक मजबूत गोल छल्ले (Ring) के साथ आपस में पिरोया गया है।

  • शाही मुहर: इस छल्ले को सुरक्षित रखने और इसकी प्रामाणिकता तय करने के लिए इस पर चोल राजवंश की आधिकारिक ‘शाही मुहर’ (Royal Seal) अंकित है।

  • लिपि और भाषा: इन प्लेट्स पर प्राचीन संस्कृत और तमिल भाषा में चोल वंश की वंशावली, उनके गौरवशाली इतिहास और तत्कालीन राज-काज के नियमों के बारे में विस्तार से उत्कीर्ण (Engrave) किया गया है।

क्या लिखा है इन प्राचीन दस्तावेजों पर?

आम तौर पर इतिहास की किताबों में प्राचीन राजाओं के बीच केवल युद्धों और सीमाओं के विस्तार का जिक्र मिलता है, लेकिन ये ‘लेडन प्लेट्स’ प्राचीन भारत के एक अलग और खूबसूरत पहलू को उजागर करती हैं।

इन ताम्रपत्रों पर यह ऐतिहासिक साक्ष्य दर्ज है कि कैसे 11वीं सदी के एक हिंदू राजा (चोल शासक) ने नागपट्टिनम (तमिलनाडु) में बने एक बौद्ध मठ (Chudamani Vihara) के रख-रखाव के लिए विशाल भूमि और पूरे के पूरे गाँवों से मिलने वाले राजस्व (टैक्स) को दान में दे दिया था।

यह दस्तावेज दो महत्वपूर्ण बातों को सिद्ध करता है:

  1. धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव: यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि प्राचीन भारत में सनातन (हिंदू) राजा अन्य धर्मों (जैसे बौद्ध धर्म) का कितना सम्मान करते थे और सभी लोग मिल-जुलकर शांति से रहते थे।

  2. वैश्विक व्यापारिक संबंध: इससे यह भी साफ होता है कि उस जमाने में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (विशेषकर श्रीविजया साम्राज्य, आधुनिक इंडोनेशिया/मलेशिया) के बीच न केवल मजबूत व्यापारिक संबंध थे, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान भी शीर्ष पर था।

भारत से नीदरलैंड कैसे पहुँचे थे ये ताम्रपत्र?

इतिहास के झरोखों को देखें तो साल 1700 के आस-पास भारत के तटीय और समुद्री व्यापारिक इलाकों पर ‘डच ईस्ट इंडिया कंपनी’ (Dutch East India Company) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। इसी दौरान एक डच ईसाई मिशनरी अधिकारी ने इन कीमती प्लेट्स को अपने कब्जे में ले लिया था और इसे यूरोप ले गया।

इसके बाद, साल 1862 में इन्हें नीदरलैंड की ‘लेडन यूनिवर्सिटी’ की लाइब्रेरी को सौंप दिया गया, जिसके बाद से इसे ‘लेडन प्लेट्स’ कहा जाने लगा। भारत की इस अनमोल धरोहर को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास कई सालों से चल रहे थे, जो वर्तमान सरकार की सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के कारण 2026 में सफल हो सके हैं।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विरासत की घर वापसी

पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने दुनिया भर के देशों से प्राचीन मूर्तियों, कलाकृतियों और दस्तावेजों को वापस लाने के अभियान में तेजी दिखाई है। चोल काल के इन 30 किलोग्राम वजनी ताम्रपत्रों का वापस आना इसी कड़ी का सबसे बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है। ये दस्तावेज़ अब भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में शोधकर्ताओं और आम जनता के देखने के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे।

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