वॉशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड और यूरोपीय वस्तुओं पर नए ‘टैरिफ’ (आयात शुल्क) की घोषणा के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूचाल आ गया है। इस औचक घोषणा के जवाब में यूरोपीय संघ (EU) ने ब्रुसेल्स में एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अमेरिका और यूरोप के बीच एक पूर्ण ‘ट्रेड वॉर’ (व्यापार युद्ध) की शुरुआत हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व और अमेरिका के व्यापारिक हितों का हवाला देते हुए यूरोपीय संघ से आने वाले विशिष्ट सामानों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यूरोपीय संघ की व्यापार नीतियां ‘अनुचित’ हैं और अमेरिका को अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए यह कड़ा कदम उठाना पड़ रहा है।
यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया:
ईयू के व्यापार आयुक्त ने इस फैसले को “एकतरफा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन” बताया है। ब्रुसेल्स में हो रही आपातकालीन बैठक में निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा होने की संभावना है:
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जवाबी टैरिफ: क्या ईयू को अमेरिकी हार्ले-डेविडसन, वाइन और टेक उत्पादों पर शुल्क बढ़ाना चाहिए?
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) में अपील: क्या इस मामले को कानूनी रूप से चुनौती दी जाए?
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एकजुटता का प्रदर्शन: ट्रंप की ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति के खिलाफ सभी 27 सदस्य देशों को एक साथ रखना।
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भारत पर क्या होगा असर?
हालांकि यह विवाद अमेरिका और यूरोप के बीच है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) जुड़ी होने के कारण भारतीय निर्यातकों पर भी इसका परोक्ष असर पड़ सकता है। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ती है, तो कच्चे तेल की कीमतों और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा एक बार फिर वैश्विक संस्थानों को चुनौती दे रहा है। ग्रीनलैंड को केंद्र में रखकर की गई यह घोषणा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है। यूरोप के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी दबाव से कैसे बचाता है।
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