
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल महानगरों के बौद्धिक विमर्श और उच्च शिक्षित नेतृत्व की गाथा नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति भारत के उन सुदूर गांवों के कच्चे रास्तों और मिट्टी के घरों में निहित थी, जहाँ साधारण दिखने वाले नागरिकों ने असाधारण वीरता का परिचय दिया। पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर (मिदनापुर) की उर्वर मिट्टी से उपजी मातंगिनी हाजरा (Matangini Hazra) एक ऐसा ही ज्वलंत नाम है।
73 वर्ष की आयु में, जब शरीर जर्जर हो जाता है और मृत्यु का भय स्वाभाविक होता है, तब उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की बंदूकों का सामना करते हुए तिरंगे को अपनी अंतिम सांस तक ऊंचा रखा। इतिहास उन्हें ‘गांधी बूढ़ी’ (Old Lady Gandhi) के नाम से याद करता है। यह नाम केवल उनकी आयु का सूचक नहीं है, बल्कि उनके अटल गांधीवादी सिद्धांतों और अहिंसक प्रतिरोध के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का सर्वोच्च सम्मान है।
प्रारंभिक जीवन: अभावों से आत्मशक्ति तक का सफर
मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के तामलुक थाना क्षेत्र के अंतर्गत ‘होगला’ नामक एक अत्यंत निर्धन किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता, ठाकुरदास मैती, एक खेतिहर मजदूर थे। गरीबी और सामाजिक कुरीतियों से भरे तत्कालीन बंगाल के ग्रामीण परिवेश में उनका बचपन बीता।
बाल विवाह और वैधव्य का दंश
उस समय की प्रचलित सामाजिक कुरीतियों के कारण, मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह 60 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। यह विवाह नहीं, बल्कि एक मासूम बच्ची के कंधों पर थोपी गई सामाजिक विवशता थी। नियति की क्रूरता देखिए कि विवाह के मात्र छह वर्ष बाद, जब वे 18 वर्ष की थीं, तब उनके पति का देहांत हो गया।
एकाकी जीवन और समाज सेवा
उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। पति की मृत्यु के बाद वे अपने सौतेले बेटे के साथ रहने लगीं, लेकिन घरेलू विवादों के कारण उन्होंने एक अलग कुटिया में रहना शुरू कर दिया। इस एकाकीपन ने उन्हें आत्मचिंतन और समाज सेवा की ओर मोड़ा। उन्होंने अपना पूरा जीवन दीन-दुखियों की सहायता और गांव की महिलाओं को संगठित करने में समर्पित कर दिया।
इतिहासकार बिपन चंद्र अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखते हैं:
“मातंगिनी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि क्रांति की ज्वाला आयु की मोहताज नहीं होती, वह केवल शुद्ध अंतरात्मा और राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम से उपजती है। उन्होंने साबित किया कि एक विधवा का जीवन केवल शोक के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र-उत्थान के लिए भी हो सकता है।”
गांधीवादी विचारधारा का उदय और राजनीतिक सक्रियता
1905 के बंग-भंग (Partition of Bengal) आंदोलन ने पूरे बंगाल में राष्ट्रवाद की लहर पैदा कर दी थी, लेकिन मातंगिनी हाजरा सक्रिय राजनीति में काफी विलंब से आईं। 1930 के दशक में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया, तब 60 वर्ष की मातंगिनी के भीतर सोया हुआ राष्ट्रभक्त पूर्णतः जागृत हो उठा।
नमक सत्याग्रह (1932)
जब गांधी जी ने दांडी मार्च के माध्यम से नमक कानून तोड़ा, तो मेदिनीपुर (विशेषकर तामलुक) विद्रोह का प्रमुख केंद्र बन गया। मातंगिनी ने महिलाओं के एक विशाल जत्थे का नेतृत्व किया।
- सक्रिय भागीदारी: उन्होंने समुद्री जल से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी।
- गिरफ्तारी और कठोर दंड: उन्हें गिरफ्तार किया गया और भीषण गर्मी में मीलों पैदल चलाकर अलीपुर जेल भेजा गया।
- आंतरिक परिवर्तन: जेल से छूटने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सक्रिय सदस्य बन गईं। ‘चरखा कातना’ और ‘खादी पहनना’ उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया। उन्होंने गांधीजी के स्वच्छता और स्वावलंबन के संदेश को गांव-गांव पहुँचाया।
‘वापस जाओ’ का साहसिक नारा (1933)
1933 में बंगाल के तत्कालीन गवर्नर सर जॉन एंडरसन तामलुक के दौरे पर थे। कड़े सुरक्षा घेरे और पुलिस के पहरे के बावजूद, एक वृद्ध महिला ने काला झंडा लहराते हुए गवर्नर की कार के सामने छलांग लगा दी और जोर से चिल्लाई— “गवर्नर, वापस जाओ!”। पुलिस की लाठियों ने उन्हें लहूलुहान कर दिया, लेकिन उनकी निर्भीकता ने ब्रिटिश प्रशासन की चूलें हिला दीं। उनकी इस हिम्मत ने स्थानीय युवाओं में नया जोश भर दिया।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन: अंतिम महाप्रयाण
अगस्त 1942 में गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ था। मेदिनीपुर में इस आंदोलन ने केवल विरोध प्रदर्शन का नहीं, बल्कि ‘ताम्रलिप्त जातीय सरकार’ (एक समानांतर सरकार) के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
29 सितंबर 1942: तामलुक का ऐतिहासिक मार्च
तामलुक के क्रांतिकारियों ने निर्णय लिया कि वे ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों—सरकारी कचहरियों और पुलिस थानों पर कब्जा करेंगे। इस ऐतिहासिक मार्च में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। 73 वर्षीय मातंगिनी हाजरा ने 6,000 प्रदर्शनकारियों, जिनमें अधिकांश ग्रामीण महिलाएं थीं, के मोर्चे का नेतृत्व संभाला।
जब जुलूस तामलुक कचहरी के पास पहुँचा, तो ब्रिटिश पुलिस ने ‘144 धारा’ का हवाला देते हुए गोलीबारी की चेतावनी दी। भीड़ पीछे हटने लगी, लेकिन मातंगिनी टस से मस नहीं हुईं।
बलिदान का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण
- पहली गोली: पुलिस की पहली गोली उनके बाएं हाथ में लगी। रक्त की धार बहने लगी, लेकिन उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और उसे फुर्ती से दाहिने हाथ में ले लिया।
- दूसरी गोली: दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में लगी। झंडा गिरने ही वाला था कि उन्होंने उसे अपने दोनों हाथों से थाम लिया और ऊंचे स्वर में ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया।
- अंतिम बलिदान: तीसरी गोली उनके माथे के बीचों-बीच लगी। मातंगिनी धरती पर गिर पड़ीं, लेकिन उनकी पकड़ तिरंगे पर इतनी मजबूत थी कि प्राण निकलने के बाद भी राष्ट्रध्वज उनके हाथों में सीधा खड़ा रहा।
India Today के एक लेख के अनुसार: “यह एक ऐसा बलिदान था जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भारत का तिरंगा किसी कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस वृद्ध महिला की आत्मा का हिस्सा था।”
ताम्रलिप्त जातीय सरकार (Tamralipta Jatiya Sarkar)
मातंगिनी हाजरा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके बलिदान ने मेदिनीपुर में ऐसी आग लगाई कि वहां एक समानांतर सरकार की स्थापना हुई, जिसे ब्रिटिश सत्ता लगभग दो वर्षों तक हटा नहीं पाई।
| विशेषता | विवरण |
| मुख्य संस्थापक | सतीश चंद्र सामंत, अजय मुखर्जी और सुशील कुमार धारा |
| कार्यकाल | 17 दिसंबर 1942 से 8 अगस्त 1944 तक |
| सशस्त्र बल | ‘विद्युत वाहिनी’ नामक स्वयंसेवक सेना का गठन (महिलाएं भी शामिल) |
| प्रमुख प्रेरणा | मातंगिनी हाजरा का बलिदान और गांधीवादी आदर्श |
| प्रमुख कार्य | अकाल राहत कार्य, सुरक्षा व्यवस्था, और स्वदेशी न्याय व्यवस्था का संचालन |
🏅 मरणोपरांत सम्मान और विरासत
स्वतंत्र भारत ने इस वीरांगना को वह सम्मान दिया जिसकी वे हकदार थीं। उनकी कहानी आज भी बंगाल के हर घर में सुनी जाती है।
- कोलकाता की पहली महिला प्रतिमा (1977): कोलकाता के सुप्रसिद्ध ‘मैदान’ क्षेत्र में स्वतंत्र भारत में किसी महिला की पहली प्रतिमा मातंगिनी हाजरा की ही स्थापित की गई। यह ऐतिहासिक क्षण था।
- डाक टिकट (2002): भारतीय डाक विभाग ने उनकी 130वीं जयंती के अवसर पर 5 रुपये का स्मारक डाक टिकट जारी किया।
- स्थानों का नामकरण: कोलकाता की प्रसिद्ध ‘हाजरा रोड’ और मेदिनीपुर के कई प्रमुख शिक्षण संस्थानों और सड़कों का नाम उनके सम्मान में रखा गया है।
- सांस्कृतिक प्रभाव: ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यासों और कहानियों में मातंगिनी जैसी वीरांगनाओं के संघर्ष को बखूबी उकेरा है, जिससे उनकी गाथा बौद्धिक जगत तक पहुँची।
आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा और निष्कर्ष
मातंगिनी हाजरा का जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति किसी आयु, लिंग, संपत्ति या औपचारिक शिक्षा की मोहताज नहीं होती। एक अनपढ़ ग्रामीण महिला, जिसने अपना अधिकांश जीवन गरीबी और सामाजिक तिरस्कार (वैधव्य) के साये में बिताया, वह अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई।
उनका बलिदान आज के युवाओं के लिए एक ‘प्रेरणापुंज’ है। वह याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता केवल उपहार में मिली वस्तु नहीं है, बल्कि यह लाखों गुमनाम शहीदों के रक्त से सींची गई विरासत है। जब तक भारत का तिरंगा आसमान में लहराएगा, ‘गांधी बूढ़ी’ मातंगिनी हाजरा का नाम अमर रहेगा।
गांधी बुढ़ी: एक अमर गाथा
सत्तर के उस पार खड़ी थी, जर्जर काया, क्षीण बदन,
पर भीतर धधक रही थी ज्वाला, राष्ट्र-भक्ति का पावन मन।
हाथों में तिरंगा थामे, वह बूढ़ी नानी निकल पड़ी,
फिरंगियों की बंदूकों के आगे, वह पर्वत सी अटल खड़ी।
एक हाथ में लगी गोलियाँ, रक्त की धारा बह निकली,
पर झुका न झंडा, थमी न शक्ति, वह शौर्य की पावन बिजली।
दूजी बांह भी बिंध गई जब, ध्वज को थाम लिया कसकर,
‘वंदे मातरम्’ का घोष गूँजा, आसमान के सीने पर।
माथे के बीचों-बीच लगी, अंतिम वह ज़ालिम गोली,
धरती माँ की गोद में सो गई, खेल लहू की होली।
प्राण पखेरू उड़ गए पर, झंडा ऊँचा ही रहा,
‘गांधी बूढ़ी’ का वह साहस, इतिहासों में अमर रहा।
सन्दर्भ :
- पुस्तकें:
- “India’s Struggle for Independence” – Bipan Chandra
- “The History of Bengal” – Sir Jadunath Sarkar
- “Women in India’s Freedom Struggle” – Suruchi Thapar
ऑनलाइन सन्दर्भ :
- Amrit Mahotsav (Govt. of India): भारत की कहानी – मातंगिनी हाजरा
- Britannica Encyclopedia: भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संदर्भ (अरुणा आसफ अली के साथ तुलनात्मक अध्ययन हेतु)
- Wikipedia: मातंगिनी हाजरा की विस्तृत जीवनी
- India Today : The Story of Matangini Hazra: A 73-year-old who died for India’s freedom
- Indian Culture, Govt of India : MATANGINI HAZRA Gandhi Buri
Matribhumisamachar


