नई दिल्ली । मंगलवार, 19 मई 2026
राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक लालकिला मैदान एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सामाजिक-सांस्कृतिक महासंगम का गवाह बनने जा रहा है। आगामी 24 मई 2026 को यहां एक वृहद ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन सुदूर राज्यों के वनवासी समाज को सनातन संस्कृति से काटने और मतांतरण (धर्म परिवर्तन) के बढ़ते विदेशी व स्थानीय षड्यंत्रों के खिलाफ संपूर्ण भारत की एकजुटता का एक बड़ा और स्पष्ट संदेश देगा।
इस समागम का मूल विचार सूत्र है: “तू मैं एक रक्त, वनवासी – ग्रामवासी – नगरवासी, हम सब भारतवासी”। इस मंत्र के साथ पूरा देश भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं को भूलकर राष्ट्रीयता की एक अटूट माला में पिरोया नजर आएगा।
भगवान बिरसा मुंडा के 150वें जयंती वर्ष पर महासंगम
यह विशाल समागम जननायक और ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है। आयोजक जनजाति सुरक्षा मंच और जनजाति जागृति समिति के अनुसार, इस समागम में देश के कोने-कोने से करीब 1.5 लाख वनवासी समाज के लोग अपने विशिष्ट पारंपरिक पहनावे, प्राचीन वाद्ययंत्रों और अनूठी लोक संस्कृति के साथ दिल्ली पहुंच रहे हैं।
यह पहली बार है जब राष्ट्रीय राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में जनजाति समाज के लोग एक साथ उपस्थित होंगे। इससे न केवल दिल्लीवासियों को जनजातीय संस्कृति को करीब से समझने का मौका मिलेगा, बल्कि वनवासी समाज की दिल्ली से भौगोलिक और मानसिक दूरी भी कम होगी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से भी 150 जनजातीय प्रतिनिधियों का जत्था दिल्ली के लिए रवाना हो चुका है, जबकि मध्य प्रदेश के मालवा, निमाड़ और महाकौशल अंचलों से विशेष ट्रेनों के जरिए 10,000 से अधिक आदिवासी इस महासंगम का हिस्सा बनने आ रहे हैं।
गृहमंत्री अमित शाह करेंगे संबोधित, ‘डी-लिस्टिंग’ पर होगी आर-पार की बात
इस समागम के गहरे सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह शामिल होंगे और विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। गौरतलब है कि उनके गृह मंत्रालय के कार्यकाल के दौरान देश को बड़े पैमाने पर नक्सलवाद के दंश से मुक्ति मिली है—वह नक्सलवाद जो दशकों से जनजातीय युवाओं को भ्रमित कर देश की मुख्यधारा से अलग रख रहा था।
सांस्कृतिक प्रदर्शनों के बीच, इस मंच से एक बेहद संवेदनशील और लंबे समय से लंबित वैधानिक विषय पर भी गंभीर विमर्श होगा। समागम में ‘डी-लिस्टिंग’ (De-listing) की मांग को प्रखरता से उठाया जाएगा। जनजातीय संगठनों का तर्क है कि:
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संविधान के नियमों के तहत यदि अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
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परंतु, अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में ऐसा स्पष्ट प्रावधान न होने के कारण कुछ लोग मतांतरण के बाद भी जनजाति का लाभ और अल्पसंख्यक योजनाओं का दोहरा लाभ उठा रहे हैं।
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मंच की मांग है कि जो लोग अपनी मूल पारंपरिक संस्कृति, पूजा पद्धति, रीति-रिवाज और जनजातीय आस्था को छोड़ चुके हैं, उन्हें जनजातीय पहचान के तहत मिलने वाले आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए।
पांच स्थानों से निकलेगी भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा
इस समागम का सबसे मुख्य और विहंगम आकर्षण देश के विभिन्न हिस्सों से आई जनजातीय महिलाओं और पुरुषों द्वारा निकाली जाने वाली भव्य सांस्कृतिक शोभायात्रा होगी।
यह शोभायात्रा दिल्ली के पांच अलग-अलग ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक स्थलों से प्रारंभ होगी, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतिनिधित्व करेगी। अपनी पारंपरिक रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे और लोक धुनों पर थिरकते हुए प्रतिभागियों की ये पांचों यात्राएं अंततः लालकिला मैदान पर आकर एक विशाल जनसभा में परिवर्तित हो जाएंगी।
प्रदर्शनी में दिखेगा 75 महापुरुषों का गौरवशाली इतिहास
लालकिला मैदान में एक विशेष राष्ट्रीय प्रदर्शनी भी लगाई जा रही है। इस प्रदर्शनी में आजादी की लड़ाई और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले 75 जनजातीय नायकों व महापुरुषों के चित्रों के साथ उनकी जीवन गाथा और शौर्य को प्रदर्शित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मुख्य मंच पर देश की विभिन्न जनजातियों से आने वाले 100 विशिष्ट गणमान्य जन उपस्थित रहेंगे, जो समाज का मार्गदर्शन करेंगे।
आगवानी और सेवा में जुटे दिल्ली के सामाजिक संगठन
इतने बड़े पैमाने पर आ रहे देश के वनवासी भाई-बहनों की सुविधा और आवभगत के लिए दिल्ली के नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता पूरी लगन से जुटे हुए हैं। व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए 20 विशेष विभाग और कई स्वागत समितियां गठित की गई हैं। दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभागियों के ठहरने (आवास), भोजन, पेयजल, सुगम यातायात, चौबीस घंटे चिकित्सा सुविधा, सुरक्षा और स्वच्छता के कड़े प्रबंध किए जा रहे हैं। लालकिला मैदान में एक अभूतपूर्व आकार का विशाल वाटरप्रूफ पंडाल तैयार किया जा रहा है ताकि मई की गर्मी में भी आयोजन निर्विघ्न संपन्न हो सके।
यह समागम केवल एक पारंपरिक नृत्य या उत्सव नहीं, बल्कि भारत की ‘स्व’ (सांस्कृतिक अस्मिता) को बचाने और देश को तोड़ने वाली ताकतों को परास्त करने का एक सांस्कृतिक शंखनाद साबित होने जा रहा है।
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