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महिला सैन्य अधिकारियों की बड़ी जीत: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 14 साल की सेवा पर भी मिलेगी पूरी पेंशन

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नई दिल्ली | मंगलवार, 24 मार्च 2026

भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में आज एक नया अध्याय जुड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सेना, नौसेना और वायु सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत कार्यरत महिला अधिकारियों के पक्ष में एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन महिला अधिकारियों को “भेदभावपूर्ण मूल्यांकन” के कारण परमानेंट कमीशन (PC) से वंचित रखा गया, उन्हें अब सेवा से मुक्त होने के बावजूद पूर्ण पेंशन दी जाएगी।

20 साल की सेवा का ‘काल्पनिक’ दर्जा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह राहत दी है। कोर्ट ने आदेश दिया कि:

  • ऐसी सभी महिला अधिकारी जिन्होंने अपनी 14 साल की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें पेंशन के उद्देश्य से 20 वर्ष की सेवा पूर्ण (Deemed Completed) माना जाएगा।

  • यह लाभ उन अधिकारियों को भी मिलेगा जो 2019, 2020 और 2021 के सिलेक्शन बोर्ड के दौरान अयोग्य घोषित कर दी गई थीं।

सिस्टम के ‘पूर्वाग्रह’ पर कोर्ट की कड़ी फटकार

अदालत ने सैन्य मूल्यांकन प्रणाली (ACR) में गहरी पैठ बना चुके लैंगिक पूर्वाग्रहों को उजागर किया। पीठ ने कहा:

“सालाना गोपनीय रिपोर्ट (ACR) लिखते समय यह मान लिया गया कि ये महिलाएं करियर में आगे नहीं बढ़ेंगी। इस ‘कैजुअल अप्रोच’ और भेदभावपूर्ण मानदंडों के कारण योग्य अधिकारियों का करियर प्रभावित हुआ। सशस्त्र बल अब पुरुषों का विशेष एकाधिकार नहीं रह सकते।”

महत्वपूर्ण अपडेट: कब से और क्या मिलेगा?

अदालत ने आर्थिक लाभ और परिचालन (Operational) जरूरतों के बीच संतुलन बनाया है:

  1. पेंशन की तिथि: यह व्यवस्था 1 नवंबर 2025 से प्रभावी मानी जाएगी।

  2. एरियर (बकाया): कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिकारियों को पिछले वर्षों के वेतन का एरियर नहीं मिलेगा, लेकिन उनकी पेंशन 20 साल की काल्पनिक सेवा के आधार पर फिक्स की जाएगी।

  3. पुनर्नियुक्ति: परिचालन प्रभावशीलता को देखते हुए कोर्ट ने दोबारा बहाली का आदेश नहीं दिया है, लेकिन वित्तीय अधिकारों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।

पृष्ठभूमि: 2019 के नीतिगत बदलावों को चुनौती

यह फैसला विंग कमांडर सुचेता एडन और अन्य महिला अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर आया है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि 2019 में लागू किए गए प्रदर्शन मानदंड ‘जल्दबाजी’ में लाए गए थे, जिससे महिला अधिकारियों को खुद को साबित करने का पर्याप्त समय नहीं मिला।

ऐतिहासिक संदर्भ

यह फैसला 2020 के प्रसिद्ध बबीता पुनिया केस और 2021 के लेफ्टिनेंट कर्नल नितीशा केस की अगली कड़ी है। जहाँ पिछले फैसलों ने स्थायी कमीशन के रास्ते खोले थे, वहीं आज के फैसले ने उन महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित की है जो सिस्टम की खामियों के कारण समय से पहले सेवानिवृत्त हो गईं।

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