रांची । सोमवार, 29 जून 2026
झारखंड में पांच दशकों (50 वर्षों) से कछुआ गति से चल रहे भूमि सर्वेक्षण कार्य को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और राजस्व विभाग के प्रति बेहद तीखी नाराजगी व्यक्त की है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ में राज्य में भूमि सर्वे को जल्द पूरा करने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका (PIL) पर सोमवार को अहम सुनवाई हुई।
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि आम जनता की जमीन और सरकारी परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक समयबद्ध भूमि सर्वेक्षण बेहद अनिवार्य है, जिसमें लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अवर सचिव के हलफनामे पर कोर्ट ने जताई कड़ी आपत्ति
सुनवाई के दौरान कोर्ट के गुस्से का सामना सबसे ज्यादा इस बात पर करना पड़ा कि अदालती आदेशों को प्रशासनिक स्तर पर कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को स्वयं उपस्थित होकर या अपने हस्ताक्षर से व्यक्तिगत शपथपत्र (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया था।
इसके बावजूद, सचिव की ओर से खुद शपथपत्र दाखिल करने के बजाय विभाग के अवर सचिव (Under Secretary) द्वारा हलफनामा अदालत में पेश कर दिया गया। हाई कोर्ट ने इसे आदेश की अवहेलना मानते हुए कड़ी फटकार लगाई और पूछा कि जब सीधे सचिव को निर्देश थे, तो अवर सचिव ने यह कदम क्यों और किसके कहने पर उठाया?
15 जुलाई तक मिला अल्टीमेटम, 21 को होगी अगली सुनवाई
हाई कोर्ट ने राज्य के राजस्व सचिव को निर्देश दिया है कि वे 15 जुलाई 2026 तक हर हाल में अपना व्यक्तिगत शपथपत्र कोर्ट में दाखिल करें। इस हलफनामे में सरकार को मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करना होगा:
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वर्तमान प्रगति (Current Status): राज्य के सभी जिलों में अब तक भूमि सर्वे का कितना प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
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आधुनिक तकनीक का प्रयोग (Use of Technology): पुराने और जर्जर भू-अभिलेखों (Land Records) को आधुनिक बनाने और उनके डिजिटलाइजेशन के लिए सरकार कौन सी नई तकनीक अपना रही है।
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निश्चित समय-सीमा (Timeline): झारखंड के सभी 24 जिलों में भूमि सर्वेक्षण का काम कब तक शत-प्रतिशत पूरा कर लिया जाएगा, इसकी एक अंतिम तारीख (डेडलाइन) बतानी होगी।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जुलाई 2026 की तारीख मुकर्रर की है।
17 जून के आदेश का नहीं हुआ पालन
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने अपने पूर्व में दिए गए 17 जून 2025 के आदेश का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने याद दिलाया कि तब सरकार को स्पष्ट रूप से 4 सप्ताह के भीतर भूमि सर्वे के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक अपनाने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया था। साथ ही, तकनीक चयन के 6 महीने के भीतर पूरे झारखंड में सर्वेक्षण कार्य को संपन्न करने का सख्त निर्देश दिया गया था। अदालत ने चिंता जताई कि इतने महीने बीत जाने के बाद भी सरकार के स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस जमीनी प्रगति दिखाई नहीं दे रही है।
महाधिवक्ता बोले- “केरल और कर्नाटक मॉडल का हो रहा है अध्ययन”
राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता (Advocate General) रोहितश्य राय ने कोर्ट से थोड़ा और समय देने का आग्रह किया। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि अगली सुनवाई से पहले विभागीय सचिव स्वयं अपना व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करेंगे।
정कार की ओर से दी गई दलीलों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
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आधुनिक राज्यों का अध्ययन: झारखंड सरकार वर्तमान में केरल, कर्नाटक और देश के अन्य उन राज्यों की आधुनिक भूमि सर्वेक्षण प्रणालियों का अध्ययन कर रही है, जहां यह प्रक्रिया बेहद सफल रही है।
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डिजिटलाइजेशन पर जोर: नई तकनीक के माध्यम से झारखंड के पुराने और 1932 के दौर के ऐतिहासिक भू-अभिलेखों का डिजिटलाइजेशन (Digitization) किया जाएगा ताकि सर्वेक्षण की गति को कई गुना बढ़ाया जा सके।
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पुरानी तकनीक है मुख्य बाधा: सरकार ने स्वीकार किया कि वर्तमान में राज्य के पास उपलब्ध सर्वेक्षण तकनीक काफी पुरानी और आउटडेटेड है, जिसके कारण फील्ड वर्क में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
1975 से चल रहा है सर्वे; सिर्फ 2 जिलों में काम पूरा
यह जनहित याचिका प्रार्थी गोकुल चंद द्वारा दाखिल की गई है। याचिका में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाया गया है कि झारखंड के इतिहास में अंतिम व्यापक और प्रामाणिक भूमि सर्वेक्षण वर्ष 1932 में हुआ था, जिसे आज भी स्थानीयता और खतियान का मुख्य आधार माना जाता है। इसके बाद साल 1975-1980 के दौर में नए सिरे से सर्वे की प्रक्रिया शुरू तो की गई, लेकिन आधी सदी (50 साल) बीत जाने के बाद भी यह मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है।
वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करते हुए सरकार ने कोर्ट को बताया कि अब तक केवल लातेहार और लोहरदगा (कुल 2 जिलों) में ही भूमि सर्वेक्षण का कार्य पूरी तरह संपन्न हो पाया है, जबकि शेष 22 जिलों में काम आज भी कछुआ गति से जारी है।
हाई कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष: अगर राज्य में समयबद्ध तरीके से पारदर्शी डिजिटल भूमि सर्वे पूरा हो जाता है, तो इससे न सिर्फ आम जनता की जमीनों पर होने वाले अवैध कब्जों और मुकदमों पर रोक लगेगी, बल्कि सरकारी जमीनों (Gair Mazarua Land) को भी भू-माफियाओं से सुरक्षित रखा जा सकेगा। इसके लिए आवश्यक मानव संसाधन (Staff) की त्वरित बहाली और आधुनिक ड्रोन व सैटेलाइट तकनीक अपनाना बेहद जरूरी है।
Matribhumisamachar


