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30 फरवरी को हुआ था जन्म? गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अजीबोगरीब डेट ऑफ बर्थ वाले नागरिकता दावे को किया खारिज

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गुवाहाटी । शनिवार, 30 मई 2026

असम में राष्ट्रीय नागरिकता और अवैध प्रवासियों की पहचान को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रियाओं के बीच एक बेहद हैरान करने वाला और अनोखा मामला सामने आया है। गुवाहाटी हाई कोर्ट (Gauhati High Court) ने एक महिला की उस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है जिसमें उसने खुद को भारतीय नागरिक घोषित करने की मांग की थी। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब अदालत ने महिला के दस्तावेजों में दर्ज उसकी जन्मतिथि को देखा। महिला ने अपने कागजात में अपना जन्मदिन 30 फरवरी 1990 बताया था।

हम सभी जानते हैं कि ग्रैगोेरियन या अंग्रेजी कैलेंडर में फरवरी के महीने में कभी भी 30 तारीख नहीं होती है। लीप ईयर (Leap Year) में भी फरवरी सिर्फ 29 दिनों की होती है। कोर्ट ने इसी तथ्य को आधार बनाते हुए महिला के इस दावे को पूरी तरह ‘अमान्य और अस्तित्वहीन’ करार दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा कानूनी मामला क्या था और कोर्ट ने इस पर क्या सख्त टिप्पणियां की हैं।

कैसे शुरू हुआ था नागरिकता का यह मामला?

इस मामले की जड़ें करीब दो दशक पुरानी हैं। 28 दिसंबर 2006 को दरंग मंगलदोई के पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) ने इस महिला की राष्ट्रीयता और नागरिकता पर संदेह व्यक्त किया था। इसके बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने मामले की विस्तृत जांच के लिए इसे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunal) के पास भेजा।

ट्रिब्यूनल द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद महिला वहां पेश हुई और उसने खुद को मूल भारतीय साबित करने के लिए एक लिखित बयान के साथ कुल 9 दस्तावेज जमा किए। उसने गवाह के तौर पर एक व्यक्ति को भी पेश किया, जिसने खुद को महिला का चाचा बताया था।

महिला ने सबूत के तौर पर क्या दस्तावेज दिए थे?

महिला ने ट्रिब्यूनल और बाद में हाई कोर्ट के समक्ष अपनी वंशावली (Lineage) साबित करने के लिए मुख्य रूप से दो वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) का सहारा लिया था:

  1. 1966 की मतदाता सूची: इसमें ‘आकाश अली’ नाम के एक व्यक्ति का नाम दर्ज था। महिला का दावा था कि आकाश अली ही उसके दादा थे।

  2. 1993 की मतदाता सूची: इस सूची में ‘नूर इस्लाम’ और ‘जहुरा’ नाम के व्यक्तियों के नाम शामिल थे। महिला के मुताबिक, ये दोनों उसके माता-पिता हैं और नूर इस्लाम असल में आकाश अली के ही बेटे हैं।

महिला के वकील एम. देव ने एविडेंस एक्ट के सेक्शन 74 (Section 74 of the Evidence Act) का हवाला देते हुए दलील दी कि चूंकि मतदाता सूची एक सार्वजनिक दस्तावेज (Public Document) है, इसलिए इसे सीधे तौर पर प्रामाणिक सबूत माना जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने दावों को क्यों माना पूरी तरह अमान्य?

जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। अदालत ने न केवल 30 फरवरी 1990 की असंभव जन्मतिथि को खारिज किया, बल्कि दस्तावेजों की प्रामाणिकता और कड़ियों (Linkage) पर भी गंभीर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला: फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट दोनों ने देश की शीर्ष अदालत के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए साफ किया कि अदालत में केवल दस्तावेज जमा कर देने से उनके भीतर लिखा कंटेंट (सामग्री) स्वतः सच साबित नहीं हो जाता। उन दस्तावेजों को कानूनी रूप से सही साबित करने के लिए उन गवाहों या अधिकारियों की गवाही जरूरी होती है जिन्होंने उन्हें तैयार किया था। इस मामले में ऐसा कोई गवाह पेश नहीं किया जा सका।

इसके अलावा, महिला ने एक हलफनामे (Affidavit) में यह भी विचित्र दावा किया था कि साल 2010 की मतदाता सूची में उसके दादा ‘आकाश अली’ का नाम बदलकर ‘अबू बक्कर’ दर्ज हो गया था और ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। कोर्ट ने बिना किसी ठोस शासकीय दस्तावेजी प्रमाण के इस मौखिक दावे को भी पूरी तरह ठुकरा दिया।

अदालत का बड़ा फैसला: मौखिक गवाही से नहीं साबित होती नागरिकता

हाई कोर्ट की बेंच ने 27 मई को दिए अपने आदेश में साफ कहा कि भले ही हम तकनीकी तौर पर मतदाता सूची को सार्वजनिक दस्तावेज मान लें, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ‘कनेक्शन’ या ‘लिंक’ का है। 1993 की सूची में नूर इस्लाम का नाम होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता का संबंध सीधे तौर पर 1971 के कट-ऑफ से पहले के पूर्वजों से है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा:

“यह पूरी तरह से स्थापित कानून है कि इस तरह की नागरिकता प्रक्रियाओं में केवल मौखिक गवाही (Oral Evidence) के आधार पर पूर्वजों के साथ प्रभावी लिंक स्थापित नहीं किया जा सकता। इसके लिए ठोस और त्रुटिहीन दस्तावेजी सबूतों (Documentary Evidence) का होना अनिवार्य है।”

इस फैसले के बाद अब आगे क्या होगा?

गुवाहाटी हाई कोर्ट द्वारा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखने के बाद अब इस महिला को कानूनी तौर पर विदेशी घोषित किए जाने की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। अब महिला के पास बेहद सीमित कानूनी रास्ते बचे हैं:

  • वह इस फैसले के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकती है।

  • हालांकि, वहां भी राहत पाने के लिए उसे अपनी वास्तविक और वैध जन्मतिथि साबित करनी होगी।

  • साथ ही, उसे अपनी वंशावली को जोड़ने वाले सरकारी रिकॉर्ड्स और उनके मूल जारीकर्ताओं को गवाह के तौर पर पेश करना होगा।

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