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छत्तीसगढ़ स्कूलों में अनिवार्य प्रार्थना आदेश हाई कोर्ट में चुनौती: जानिए क्या है पूरा विवाद और सांविधानिक अधिकार

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बिलासपुर । बुधवार, 1 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी स्कूलों में दैनिक प्रार्थनाओं को लेकर जारी किया गया एक नया आदेश विवादों के घेरे में आ गया है। विभाग द्वारा 12 जून 2026 को जारी इस निर्देश के तहत प्रदेश के सभी शासकीय विद्यालयों में प्रतिदिन सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, गायत्री मंत्र, शांति मंत्र और भोजन मंत्र का आयोजन अनिवार्य कर दिया गया था। अब इस आदेश की वैधानिकता को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (High Court) में एक रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है।

यह मामला सामने आने के बाद एक बार फिर देश में शिक्षा के भगवाकरण, धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई है।

याचिकाकर्ता के तर्क: क्यों बताया जा रहा है इसे असंवैधानिक?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए देश के जाने-माने अधिवक्ता डॉ. आमिर खान ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के समक्ष कई गंभीर सांविधानिक सवाल उठाए हैं। डॉ. खान ने स्पष्ट किया कि इस कानूनी चुनौती का उद्देश्य किसी धर्म या परंपरा का विरोध करना नहीं है, बल्कि देश में संविधान की सर्वोच्चता और सभी विद्यार्थियों के समान अधिकारों को सुरक्षित करना है।

अधिवक्ता डॉ. आमिर खान ने याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित सांविधानिक बिंदुओं को रेखांकित किया है:

  • अनुच्छेद 28 का स्पष्ट उल्लंघन: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28(1) साफ तौर पर यह प्रावधान करता है कि राज्य निधि (सरकारी बजट) से पूरी तरह से पोषित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई भी ‘धार्मिक शिक्षा’ (Religious Instruction) नहीं दी जा सकती। चूंकि शासकीय स्कूल पूरी तरह सरकारी पैसे से चलते हैं, इसलिए वहां किसी विशेष धर्म से जुड़े मंत्रों को अनिवार्य करना इस अनुच्छेद की भावना के विपरीत है।

  • समानता और गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 21): स्कूलों में विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं के बच्चे पढ़ने आते हैं। किसी एक धार्मिक पद्धति की प्रार्थनाओं को सभी के लिए अनिवार्य करना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) को प्रभावित करता है।

  • धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25): संविधान हर नागरिक को अपनी इच्छा के अनुसार धर्म को मानने या किसी भी धार्मिक आचरण का हिस्सा न बनने की आजादी देता है। बच्चों को जबरन किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने के लिए विवश करना उनकी इस स्वतंत्रता पर चोट है।

“विद्यालयों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) और सांविधानिक मूल्यों का केंद्र होना चाहिए, न कि किसी विशेष धार्मिक परंपरा के प्रचार-प्रसार का माध्यम।”

डॉ. आमिर खान, अधिवक्ता

क्या कहता है कानून और पूर्व के अदालती फैसले?

इस तरह के मामलों पर भारत के कानूनी इतिहास में पहले भी कई महत्वपूर्ण फैसले आ चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का रुख हमेशा से इस बात पर निर्भर रहा है कि क्या स्कूलों में किया जा रहा आयोजन ‘धार्मिक’ है या ‘सांस्कृतिक’।

  1. अनिवार्यता बनाम स्वैच्छिकता: अदालतें अक्सर इस बात को देखती हैं कि क्या छात्रों को प्रार्थना में शामिल होने के लिए बाध्य किया जा रहा है। प्रसिद्ध बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि कोई अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान गाने से मना करता है और सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता।

  2. सांस्कृतिक मूल्य: सरकारें अक्सर तर्क देती हैं कि सरस्वती वंदना या कुछ मंत्र किसी धर्म विशेष के न होकर भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों का हिस्सा हैं। अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट को तय करना होगा कि 12 जून का यह आदेश केवल नैतिक शिक्षा के दायरे में आता है या यह धार्मिक निर्देशों को लागू करने का प्रयास है।

याचिका में की गई मुख्य मांगें

उच्च न्यायालय में दायर इस रिट याचिका में अदालत से निम्नलिखित अंतरिम और अंतिम राहत देने का अनुरोध किया गया है:

  1. स्कूल शिक्षा विभाग के 12 जून 2026 के इस विवादित आदेश को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर निरस्त (Quash) किया जाए।

  2. जब तक मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस आदेश के क्रियान्वयन और जमीनी स्तर पर इसकी अनिवार्यता पर तत्काल रोक (Stay) लगाई जाए।

यह मामला आने वाले दिनों में देश के शिक्षा तंत्र और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के बीच की सीमाओं को तय करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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