बुधवार, मई 13 2026 | 07:43:24 PM
Breaking News
Home / राष्ट्रीय / सबरीमाला से मस्जिद तक: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ करेगी धर्म की नई व्याख्या, जानें पूरा शेड्यूल

सबरीमाला से मस्जिद तक: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ करेगी धर्म की नई व्याख्या, जानें पूरा शेड्यूल

Follow us on:

तिरुवनंतपुरम | रविवार, 5 अप्रैल, 2026

उच्चतम न्यायालय में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दों पर फिर से कानूनी महासंग्राम शुरू होने वाला है। 7 अप्रैल, 2026 से मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ उन पुनर्विचार याचिकाओं और संवैधानिक सवालों पर सुनवाई शुरू करेगी, जो न केवल हिंदू धर्म बल्कि मुस्लिम और पारसी धर्मों की परंपराओं को भी प्रभावित कर सकते हैं।

सुनवाई का पूरा शेड्यूल: 22 अप्रैल तक चलेगा तर्क-वितर्क

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी ताज़ा जानकारी के अनुसार, इस लंबी सुनवाई के लिए विस्तृत समय सारणी तय की गई है:

  • 7 से 9 अप्रैल: पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्ष (जो 2018 के फैसले के खिलाफ हैं) अपनी दलीलें रखेंगे।

  • 14 से 16 अप्रैल: 2018 के फैसले का समर्थन करने वाले और समीक्षा का विरोध करने वाले पक्ष अपनी बात कहेंगे।

  • 21 अप्रैल: प्रति-उत्तर (Rejoinder) प्रस्तुत किए जाएंगे।

  • 22 अप्रैल: एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) की अंतिम दलीलों के साथ सुनवाई समाप्त होने की उम्मीद है।

संविधान पीठ में कौन-कौन शामिल हैं?

CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली इस पीठ में देश के वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल हैं:

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन मसीह, जस्टिस प्रसन्ना वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची।

AIMPLB का कड़ा रुख: “अदालतें न बनें धर्मगुरु”

इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने लिखित दलीलें दाखिल कर न्यायिक हस्तक्षेप पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। बोर्ड की दलीलों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  1. अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ERP) का सिद्धांत: बोर्ड का कहना है कि ‘क्या आवश्यक है और क्या नहीं’, यह तय करना अदालतों का काम नहीं है। यह अनुयायियों और धार्मिक विद्वानों का विषय है।

  2. समानता का अर्थ एकरूपता नहीं: बोर्ड ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 के तहत हर धर्म को अपनी विशिष्टता का अधिकार है। सभी धर्मों पर एक जैसा नियम थोपना ‘असमानता’ को जन्म दे सकता है।

  3. संवैधानिक नैतिकता: बोर्ड के अनुसार, धार्मिक मामलों में ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के नाम पर तब तक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए जब तक कि कोई ठोस कारण न हो।

क्यों महत्वपूर्ण है यह सुनवाई?

यह मामला अब केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रह गया है। 9 जजों की यह पीठ 7 प्रमुख संवैधानिक सवालों के जवाब तलाशेगी, जिनमें शामिल हैं:

  • क्या कोई व्यक्ति जो उस धर्म का नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए उस धर्म की प्रथा को चुनौती दे सकता है?

  • ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के बीच टकराव होने पर किसे प्राथमिकता दी जाए?

  • क्या अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) पर हावी है?

पृष्ठभूमि: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। बाद में भारी विरोध और पुनर्विचार याचिकाओं के बाद, तत्कालीन CJI रंजन गोगोई ने इस मामले को बड़ी पीठ (9 जजों) को भेज दिया था ताकि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे समान मुद्दों को भी स्पष्ट किया जा सके।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े कानूनी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हस्तक्षेप कर अदालतों द्वारा ‘धार्मिक प्रथाओं’ की व्याख्या करने पर आपत्ति जताई है। जानें क्या होगा इस सुनवाई का देश के अन्य धर्मों पर असर।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली का चित्र

सुबह खाली पेट गर्म पानी पीने के फायदे: क्या यह वास्तव में ‘जादुई’ है?

नई दिल्ली । मंगलवार, 12 मई 2026 आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में, हम अक्सर …