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उफ्फ यह प्रेम है क्या? जीवन मूल्यों के ह्रास का भयावह मंजर

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– डॉ घनश्याम बादल

इससे पहले कि श्रद्धा हत्याकांड की बात की जाए मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यह देश प्रेम के खिलाफ नहीं है ।  मर्जी से एक दूसरे के साथ रहने को भी कानूनी मान्यता मिल चुकी है । दो बालिग व्यक्ति अपनी पसंद के साथी चुन सकते हैंऔर साथ रह सकते हैं ।  भले ही विवाह के बंधन में न बंधने की वजह से छोटे शहरों एवं निम्न मध्यमवर्गीय समाज के लोग ऐसे संबंधों को गलत मानते  हों लेकिन महानगरों में अब एक बहुत बड़ा खाता पीता ऐसा वर्ग है जो ऐसी बातों की परवाह नहीं करता । सच बात तो यह है कि धन दौलत की अधिकता एवं जी  कमाने की धुन में लगे युवा समाज को कुछ मानते ही नहीं तो फिर परवाह करने की जरूरत भी नहीं समझते । संभवतः श्रद्धा एवं आफताब के केस के मूल में भी यही भावना रही है ।

वें माया नगरी मुंबई में एक दूसरे से महज तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर रहते बताए जाते हैं पर भीड़भाड़ वाले इस नगर में एक दूसरे को जानते होंगे ऐसा बहुत कम लगता है । इन्हें मिलवाने का काम किया डेटिंग एप ‘बंबल’ ने आज बम्बल जैसे कितने ही डेटिंग एप सोशल मीडिया पर आसानी से मिल जाते हैं । सरल शब्दों में कहें तो यह पुराने जमाने के बिचौलियों का काम करते हैं लोगों को आपस में मिलवाते हैं ‌ और इनकी जिम्मेदारी यहीं पर समाप्त हो जाती है लेकिन पहले जमाने के बिचौलिए लंबे समय तक उन लोगों पर निगाह रखते थे जिनके बीच में संबंध कराते थे और समाज भी कुछ ऐसा वैसा होने पर बिचौलियों को पकड़ता था लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं है । इसका परिणाम भी सामने है। ऐसे ऐसे  भयावह प्रकरण हो रहे हैं कि विश्वास नहीं होता।

अब बात विश्वास की करें तो प्रेम और विश्वास एक दूसरे के पूरक हैं आपसी संबंध भी बिना विश्वास के नहीं चलते ।  अब इसी आपसी विश्वास के चलते युवा लोग जो खुद को अत्याधुनिक मानते हैं लिव इन रिलेशन में रहने लगते हैं एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि वह विवाह से पहले एक दूसरे को इतना परख लेना चाहते हैं कि संशय की कोई गुंजाइश ही न रहे । अब एक छत के नीचे एक कमरे में यदि दो विपरीत लिंगी रहें तो फिर यह संभावना भी प्रबल हो जाती है कि उनके बीच दैहिक संबंध होना भी बहुत स्वाभाविक है । खैर एक बार फिर कौन किस से संबंध रखता है या बनाता है यह नितांत निजी मामला हो जाता है । आफताब और श्रद्धा निकट आए, इतने निकट आए कि दोनों अपने परिवारों को छोड़कर मुंबई से दिल्ली शिफ्ट हो गए । साथ रह रहे थे स्वभाविक है महानगरीय संस्कृति के चलते हुए किसी को यह जानने की जरूरत भी नहीं थी कि वे कौन हैं व  कैसे रह रहे हैं और उनके बीच में क्या संबंध है ।  दोनों स्वाभाविक रूप से अपने अपने कामों पर जाते होंगे यानी दिन में अलग-अलग और रात में साथ इसमें से भी देखें तो साथ 8 घंटे की नींद यानी महज 4 घंटे का साथ मान सकते हैं और  इतने कम साथ में ही संबंधों में इतनी कटुता आई कि श्रद्धा के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए ।

पुलिस के मुताबिक आफताब ने अपना जुर्म कबूल किया है अब न्यायालय में क्या होगा यह देखने वाली बात है । (  वैसे अभी अभी दो निचली अदालतों से फांसी की सजा पाने वाले अभियुक्त भी रिहा किए गए हैं और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारे भी ‘अच्छे आचरण’ के चलते रिहा हो रहे हैं।)  इस पर कुछ कहना अभी ठीक नहीं पर हर बात पर मौन साध लेना या चुप्पी खींच लेना सुरक्षित तो कर सकता है मगर समाज इस चुप्पी की छाती पर सवार होकर गहरे गर्त में जाता हुआ भी साफ दिख रहा है। प्रेम एक आत्मिक अनुभूति है । एक दूसरे के प्रति समर्पण, निष्ठा  एवं विश्वास का प्रतीक है मगर जब यह तथाकथित प्रेम केवल दैहिक या यौनिक मात्र रह जाए अथवा आकर्षण समाप्त हो जाए या फिर मन में वासना का विकार और ज्वर  हावी हो जाए तो फिर वह एक से संतुष्ट नहीं । रहता शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा इस लिव इन रिलेशन में भी ।

श्रद्धा एवं आफताब के बीच मनमुटाव की परिणिति  एक अमानुष एक एवं बर्बर हत्याकांड जैसे कृत्य में तब्दील हो गई । कितना भयावह मंजर लगता है जब एक व्यक्ति अपने साथ रहने वाली दूसरी लड़की की  केवल हत्या ही नहीं करता अपितु उसके शव के 35 टुकड़े करता है उन्हें फ्रिज में सहेज कर रखता है दूसरी लड़की को फ्लैट में बुलाता है और  टुकड़े रात के अंधेरे में ले जाकर जंगल में फेंक कर आता है और चैन से सो जाता है तो सुनने वाले की भी रूह कांप उठती है । मगर शैतान का दिल नहीं डरता वह फर्राटेदार अंग्रेजी में कबूल करता है ‘यस आई किल्ड हर’ । आधुनिक होना बुरा नहीं है लेकिन आधुनिकता के नाम पर जीवन मूल्यों को ताक पर रख देना, नैतिकता को दरकिनार कर देना भौतिकता के गर्त में इतना डूबना कि आत्मा से आत्मा का मिलन महज एक शाब्दिक लफ्फाजी  मात्र रह जाए तो फिर इस समाज को सभ्य कहने से पहले  सौ बार सोचना पड़ता है ।

भले ही न्यायालय, सरकार, प्रशासन या समाज आधुनिकता के नाम पर ‘लिव इन’ या ऐसी ही दूसरी प्रवृत्तियों को स्वीकृति दे दे या आंख मूंद कर बैठ जाए लेकिन पश्चिमी देशों के अंधानुकरण की यह प्रवृत्ति हमें कहां ले जा रही है यह साफ दिख रहा है । बात – बात पर धरने प्रदर्शन एवं विरोध करने वाली सामाजिक संस्थाएं तो बहुत हैं ।  मगर ऐसे मुद्दों पर अड़ने एवं लड़ने वाली संस्थाएं एवं लोग कहीं गायब होते जा रहे हैं । क्यों न एक ऐसी संस्था सरकार या राष्ट्र की तरफ से खड़ी की जाए जो इस प्रकार के संवेदनशील एवं नैतिक मूल्यों से संबंधित प्रकरणों पर स्वयं संज्ञान लेकर इन्हें रोके । यहां सवाल केवल श्रद्धा या आफताब का नहीं है ‘लव जिहाद’ का भी नहीं है,विजातीय प्रेम के नाम पर शोषण या पाशविकता का भी नहीं है बल्कि यह प्रश्न है मनुष्यता का । उससे भी बड़ा प्रश्न है जीवन मूल्यों एवं नैतिकता का । हर हाल में इस पतन को रोकने के लिए आज आगे आने की जरूरत तो है ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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