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पहाड़ के विकास के सच्चे धुनी इंद्रमणि बडोनी

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– डॉ घनश्याम बादल

उत्तराखंड को बने हुए 22 वर्ष पूरे हो गए हैं । उत्तर प्रदेश का पहाड़ रूपी सर काटकर यह प्रदेश उत्तरांचल के नाम से सन 2000 में अस्तित्व में आया और इसका एकमात्र उद्देश्य था पहाड़ तक विकास के रथ को पहुंचाना । वही पहाड़ जो उस समय उपेक्षित था, जहां विकास की किरण या तो पहुंच ही नहीं पाती थी या बहुत देर से जाती थी,  जहां का पानी और जवानी मौका मिलते ही वहां से उतरकर मैदानों और घाटियों में खो जाते थे। उस समय पहाड़ से जुड़े हुए एवं उससे प्यार करने वाले बहुत सारे लोगों ने इस पहाड़ी राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया नाम बहुत सारे हैं काम भी बहुत लोगों ने किया मगर इन नामों के बीच में एक दाढ़ी वाला शख्स जो सिर पर अक्सर रुमाल बांधे रखता था लगभग हर आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाता था उस शख्स का नाम था इंद्रमणि बडोनी। उत्तराखंड राज्य के निर्माण में उनकी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण थी कि लोग उन्हें आज भी उत्तराखंड के गांधी के नाम से याद करते हैं। आज 24 दिसंबर को उनकी 99 वीं जयंती है ।

उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आंदोलन के प्रणेता इन्द्रमणि बडोनी का जन्म 24 दिसंबर , 1924 को तत्कालीन टिहरी रियासत में जखोली विकास खंड के अंतर्गत अखोड़ी गाँव में हुआ था । पर्वतीय परिवेश में प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने देहरादून से उच्च शिक्षा प्राप्त की । छात्र जीवन से ही वह टिहरी रियासत की राजशाही के चंगुल में प्रजा के कष्टों से परिचित थे , अत : स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात टिहरी रियासत का विलय हो जाने पर बडोनी अपने क्षेत्र की सामाजिक – सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ गए। इंद्रमणि बडोनी  1962 में जखोली विकासखंड के प्रमुख पद पर निर्वाचित हुए तथा 1967 में प्रथम बार गढ़वाल के देवप्रयाग क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए । उन्होंने इस क्षेत्र का तीन बार ( 1967 , 1969 तथा 1977 में  ) विधायक के रूप में प्रतिनिधित्व किया । वह सन् 1980 में उत्तर प्रदेश ‘ पर्वतीय विकास कुशल परिषद ‘ के उपाध्यक्ष भी रहे ।

1977 में श्री बडोनी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड राज्य – परिषद ‘ का गठन हुआ । उनके प्रयासों से 1979 में राज्य प्राप्ति आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने हेतु एक क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन , ‘उत्तराखण्ड क्रांति दल’ का निर्माण हुआ । यू के डी का नेतृत्व करते हुए स्वर्गीय बडोनी ने पर्वतीय क्षेत्र में आंदोलन का शंखनाद किया और 105 दिन की पदयात्रायें की ।  सैकड़ों गाँवों , कस्बों तथा नगरों में उन्होंने जन – जन को राज्य प्राप्ति आंदोलन से जोड़ दिया । अत्यंत सादगी भरा जीवन , गाँधीवादी अहिंसात्मक संदेश और निरंतर पदयात्राओं के कारण वह ‘उत्तराखण्ड के गाँधी’ कहलाने लगे। सन् 1994 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश. सरकार  की आरक्षण विरोधी  व  दमनकारी नीतियों के से  आंदोलन उग्र हो गया । फलतः बडोनी ने अनेक सत्याग्रहियों के साथ 2 अगस्त 1994 को गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी में आमरण अनशन कर दिया ।

पर, स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी का उत्तराखंड बनते हुए देखने का सपना पूरा न हो सका क्योंकि राज्य निर्माण से पूर्व ही 18 अगस्त 1999 को वें गोलोक वासी हो गए। उनके के नेतृत्व में उत्तराखण्ड की संघर्षरत जनता ने 9 नवंबर 2000 को अपना नया राज्य प्राप्त किया मगर तब तक उत्तराखंड का यह गांधी नश्वर शरीर से मुक्त हो चुका था । उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन की शुरुआत करने वाले इंद्रमणि बड़ोनी को उत्तराखंड का गांधी यूं ही नहीं कहा जाता है, इसके पीछे उनका संघर्ष व  त्याग रहा है। उत्तराखंड  राज्य निर्माण आंदोलन में  उनकी सोच  के लिए आज भी उउन्हें श्रद्धापूर्वक  याद किया जाता है।

इंद्रमणि बड़ोनी के पिता का नाम सुरेश चंद्र बडोनी था। साधारण परिवार में जन्मे बड़ोनी का जीवन अभावों में गुजरा। शिक्षा दीक्षा उनके पैतृक गांव में ही हुई। देहरादून से उन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल की थी। वह ओजस्वी वक्ता होने के साथ ही रंगकर्मी भी थे।  इंद्रमणि बडोनी कई लोकवाद्य यंत्रों  बजाने में भी निपुण थे और अच्छे नृतक भी थे। 1953 में, जब बड़ोनी अपने गांव में सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में जुटे थे तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की शिष्या रहीं मीराबेन टिहरी भ्रमण पर पहुंची वहां वे किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति से मिलना चाहती थी जिससे पर्वतीय क्षेत्र के विकास हेतु चर्चा की जा सके । गांव में उस समय अकेले बड़ौनी ही पढ़े लिखे व्यक्ति थे बड़ोनी की मीराबेन से मुलाकात हुई और इस मुलाकात का असर उन पर इतना पड़ा कि वह महात्मा गांधी के बताए सत्य व अहिंसा के रास्ते पर चल पड़े।

बडोनी के अनोखे अंदाज से  पूरे प्रदेश में उनकी ख्याति फैल गई और  लोग उन्हें उत्तराखंड का गांधी कहने लगे ।  इस तरह वें  उत्तराखंड का गांधी बने ।  उनके कार्यों एवं व्यक्तित्व को देखते हुए यह सम्मान कदाचित गलत नहीं है आज समय की मांग है कि इंद्रमणि बडोनी जिस शिद्दत के साथ उत्तराखंड के लिए लड़े । उन्होंने जैसे उत्तराखंड का सपना देखा था जिस प्रकार से पहाड़ को विकास की ऊंचाइयों तक पहुंचते हुए देखना चाहते थे सरकारें उस दिशा में कार्य करें तो बेशक उत्तराखंड देश के अग्रणी राज्यों में शुमार हो सकता है ।

 लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं

नोट : लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से

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