लोड हो रहा है...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी मामले पर मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

लखनऊ. ज्ञानवापी परिसर के स्वामित्व विवाद को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आया है। यह मंदिर समर्थकों के पक्ष में है। हाई कोर्ट ने सिविल वाद को पोषणीय माना है और कहा है कि प्लेसेस आफ वर्शिप एक्ट 1991 से सिविल वाद बाधित नहीं है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ बहुप्रतीक्षित प्रकरण में सुनवाई की गई।

कोर्ट ने अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी व‌ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं और सर्वे रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के साथ ही सर्वे जारी रखने की छूट दी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला  ज्ञानवापी स्थित स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर नाम मंदिर के जीर्णोद्धार का मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

रिपोर्ट के आधार पर निकल सकेगा हल

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के सर्वे रिपोर्ट के आधार पर ज्ञानवापी परिसर के स्वामित्व विवाद का हल निकल सकेगा। करोड़ों हिंदुओं की आस्था जीवंत हो उठेगी। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने सिविल वाद की पोषणीयता पर मुस्लिम पक्ष की आपत्ति आधार हीन करार देते हुए कहा कि परिसर का सर्वे कराने के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं है। कोर्ट ने सभी अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए हैं।

वजूखाने का भी होगा सर्वे

ज्ञानवापी मामले को लेकर उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई पर वकील विजय शंकर रस्तोगी ने बताया, “मुस्लिम पक्ष की तरफ से जो याचिकाएं दाखिल की गई थी उन्हें खारिज कर दिया गया…उच्च न्यायालय ने निचली अदालत को 6 महीने के अंदर मामले में अंतिम फैसला सुनाने को कहा है…वजूखाने का सर्वे भी होगा…।”

- Advertisement -

वाराणसी अदालत के समक्ष दायर मुकदमे में तर्क दिया गया है कि मस्जिद, मंदिर का हिस्सा है। अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने वाराणसी की अदालत में लंबित वाद के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील दायर की है, यह कहते हुए कि विवादित स्थल पूजास्थल अधिनियम से निषिद्ध है।

हाई कोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष ने फैसले को बताया ऐतिहासिक

ज्ञानवापी प्रकरण में इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने कहा, “यह फैसला ऐतिहासिक फैसला है क्योंकि सभी पक्षों को यह कहा गया है कि मामले को 6 महीने में निस्तारित किया जाए और याचिकाओं को खारिज किया है… अगर एक पक्ष पीड़ित है तो उसके लिए ऊपर की अदालत खुली है।”

जिला अदालत 32 साल पहले वर्ष 1991 में दाखिल किए गए सिविल वाद  के खिलाफ अंजुमन इंतेजामिया कमेटी वाराणसी तथा सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने  याचिकाएं दायर की थीं। कुल पांच याचिकाएं इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित थीं। दो याचिकाओं में 1991 में वाराणसी की जिला अदालत में दायर मूल वाद की पोषणीयता को चुनौती  दी गई थी तो तीन याचिकाओं में अदालत के परिसर के सर्वे आदेश को चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने की प्रकरण की सुनवाई

इस प्रकरण की  न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने भी सुनवाई की थी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर ने अगस्त में जस्टिस पाडिया से यह मामला अपने पास ले लिया था। न्यायमूर्ति दिवाकर के नवंबर में सेवानिवृत्त होने के बाद न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल सुनवाई कर रहे थे। आठ दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।

साभार : दैनिक जागरण

- Advertisement -

भारत : 1857 से 1957 (इतिहास पर एक दृष्टि) पुस्तक अपने घर/कार्यालय पर मंगाने के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं

https://www।amazon।in/dp/9392581181/

https://www।flipkart।com/bharat-1857-se-1957-itihas-par-ek-drishti/p/itmcae8defbfefaf?pid=9789392581182

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।