प्रयागराज | मंगलवार, 12 मई 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक मुस्लिम प्रोफेसर द्वारा सनातन धर्म अपनाने (घर वापसी) के आवेदन को खारिज करने पर जिला प्रशासन के प्रति कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। अदालत ने एडीएम (प्रशासन) के आदेश को क्षेत्राधिकार से बाहर और पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए उस पर रोक लगा दी है।
मुख्य मामला और पृष्ठभूमि
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध एक संस्थान में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत अनिल पंडित (पूर्व नाम मोहम्मद अहसान) ने अपनी स्वेच्छा से सनातन धर्म अपनाया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक आवेदन किया था।
प्रोफेसर अनिल और उनकी पत्नी अपर्णा बाजपेयी (जो स्वयं एक शिक्षिका हैं) ने अदालत को बताया कि उनका विवाह आपसी सहमति से हुआ है और वे लंबे समय से हिंदू संस्कृति की ओर आकर्षित थे। हालांकि, अपर्णा के पिता ने इस धर्म परिवर्तन और विवाह का विरोध करते हुए आपराधिक मामला दर्ज कराया था।
एडीएम की भूमिका पर कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने पाया कि:
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पुलिस रिपोर्ट का नजरअंदाज करना: पुलिस ने अपनी दो शुरुआती जांच रिपोर्टों में स्पष्ट किया था कि धर्म परिवर्तन बिना किसी दबाव या लालच के हुआ है। इसके बावजूद, एडीएम ने बार-बार नई जांच के आदेश दिए।
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शक्ति का दुरुपयोग: कोर्ट ने कहा कि एडीएम ने केवल एफआईआर (FIR) को आधार बनाकर धर्म परिवर्तन को अवैध ठहराया, जबकि उनका कार्य केवल यह देखना था कि क्या प्रक्रिया कानूनी रूप से सही है।
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कानूनी प्रक्रिया का पालन: अनिल पंडित ने धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले आवेदन देकर धारा 8(1) का पूर्ण पालन किया था, जिससे उनका धर्म परिवर्तन कानूनी रूप से मान्य है।
भविष्य के निहितार्थ
अदालत ने मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए (चूंकि अपर्णा गर्भवती हैं) प्रशासन को निर्देश दिया है कि वह 26 मई 2026 तक इस मामले पर पुनर्विचार कर नया आदेश पारित करे। तब तक एडीएम का पुराना दमनकारी आदेश स्थगित रहेगा।
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