जम्मू | बुधवार, 22 अप्रैल 2026
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक नया हलफनामा दायर कर कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक के काले कारनामों की परतें खोली हैं। एजेंसी ने दावा किया है कि मलिक केवल एक स्थानीय अलगाववादी नहीं था, बल्कि वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सीनेट के सदस्यों और सभी प्रांतों के मुख्यमंत्रियों के साथ सीधे संवाद में था।
अलगाववाद का ‘विदेशी’ प्रोपेगेंडा
NIA के अनुसार, मलिक इन उच्च-स्तरीय संबंधों का उपयोग जम्मू-कश्मीर में भारत-विरोधी नैरेटिव (Narrative) बनाने और अलगाववादी एजेंडे को हवा देने के लिए करता था। हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि मलिक ने पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों में अपनी पैठ का इस्तेमाल घाटी में अशांति फैलाने के लिए एक हथियार के रूप में किया।
आतंकी आकाओं से ‘दोस्ती’ और ‘गांधीवादी’ होने का मुखौटा
एजेंसी ने मलिक के उस दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें वह खुद को अहिंसक और गांधीवादी विचारधारा वाला बताता रहा है। NIA ने सबूत पेश करते हुए कहा कि मलिक के संबंध दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकियों से रहे हैं:
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हाफिज सईद: लश्कर-ए-तैयबा का सरगना और मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड।
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सैयद सलाहुद्दीन: हिज्बुल मुजाहिदीन का प्रमुख।
NIA का तर्क: मलिक ने विदेशी राजनयिकों और नौकरशाहों के साथ अपनी तस्वीरों का उपयोग केवल अपनी आतंकी गतिविधियों पर पर्दा डालने और सहानुभूति बटोरने के लिए किया।
पूर्व प्रधानमंत्रियों से संवाद की दलील बेअसर
अदालत में यासीन मलिक ने बचाव करते हुए तर्क दिया था कि पूर्व में कई भारतीय प्रधानमंत्रियों ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए उसे बातचीत की मेज पर बुलाया था। इस पर NIA ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा:
“किसी भी पूर्व राजनैतिक संवाद का मतलब यह नहीं है कि मलिक को उसके द्वारा किए गए गंभीर आतंकी अपराधों और टेरर फंडिंग से मुक्ति मिल जाए। अपराध और संवाद दो अलग-अलग विषय हैं।”
NIA की मांग: ‘उम्रकैद नहीं, फांसी चाहिए’
यह पूरा कानूनी घटनाक्रम NIA की उस याचिका के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जिसमें एजेंसी ने मलिक को मिली उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा को मृत्युदंड (Death Penalty) में बदलने की अपील की है। 2022 में ट्रायल कोर्ट ने उसे आतंकी फंडिंग के मामले में दोषी करार दिया था, लेकिन NIA का मानना है कि मलिक का अपराध “दुर्लभतम से दुर्लभ” (Rarest of Rare) श्रेणी में आता है।
मुख्य बिंदु जो मलिक के खिलाफ हैं:
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JKLF की कमान: वह खुद स्वीकार कर चुका है कि वह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का कमांडर-इन-चीफ था।
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सुनियोजित साजिश: कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए विदेशों से फंड जुटाना।
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हिंसा को बढ़ावा: घाटी में युवाओं को हथियार उठाने के लिए प्रेरित करना।
तथ्य
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भ्रम: कुछ लोग इसे केवल राजनीतिक विरोध का मामला मानते हैं।
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तथ्य: यह मामला विशुद्ध रूप से आतंकी फंडिंग (Terror Funding) और भारत की संप्रभुता के खिलाफ युद्ध छेड़ने का है, जिसे लेकर NIA ने ठोस डिजिटल और दस्तावेजी सबूत पेश किए हैं।
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