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पहचान छिपाकर शादी और प्रताड़ना: एटा मामले के कानूनी पहलू और पीड़िता के अधिकार

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एटा । रविवार, 24 मई 2026

एटा जिले के अवागढ़ थाना क्षेत्र से सामने आया मामला बेहद संवेदनशील और कानूनी रूप से जटिल है। एक युवती ने मोहम्मद आरिफ नामक युवक पर “आर्यन यादव” बनकर, फर्जी आधार कार्ड दिखाकर प्रेम संबंध बनाने और बाद में जबरन निकाह व उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है। इस मामले में पुलिस का यह कहना कि “घटनाक्रम दिल्ली का है इसलिए एफआईआर वहीं होगी”, तकनीकी रूप से आंशिक सही हो सकता है, लेकिन यह पीड़िता को तुरंत राहत देने के कानूनी कर्तव्यों से पुलिस को मुक्त नहीं करता।

आइए इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं, इसमें सुधार की संभावनाओं और पीड़िता के अधिकारों को विस्तार से समझते हैं।

1. क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का भ्रम और ‘जीरो एफआईआर’ (Zero FIR)

इस मामले में सबसे बड़ा पेंच क्षेत्राधिकार को लेकर फंस रहा है। अवागढ़ पुलिस का तर्क है कि शादी, पहचान छिपाना और प्रताड़ना दिल्ली के प्रीत विहार क्षेत्र में हुई, इसलिए मामला वहीं दर्ज होना चाहिए।

कानूनी सुधार और वास्तविकता:

  • जीरो एफआईआर का प्रावधान: भारतीय कानून के अनुसार, यदि कोई पीड़ित किसी ऐसे पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराता है जहां घटना नहीं हुई है, तो भी पुलिस शिकायत दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। पुलिस को ‘Zero FIR’ दर्ज करनी होती है।

  • आगे की प्रक्रिया: जीरो एफआईआर दर्ज करने के बाद स्थानीय पुलिस डायरी में मामला दर्ज कर उसे संबंधित क्षेत्र (इस मामले में दिल्ली पुलिस) को जांच के लिए ट्रांसफर कर देती है। पीड़िता को दर-दर भटकाना कानून की मूल भावना के खिलाफ है।

2. पहचान छिपाकर शादी करना: नए कानूनों में सख्त प्रावधान

पुराने कानूनों की तुलना में अब पहचान छिपाकर या शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने को लेकर कानून बेहद सख्त हो चुके हैं।

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधान: नए कानूनों के तहत यदि कोई व्यक्ति अपनी असली धार्मिक या सामाजिक पहचान छिपाकर, फर्जी दस्तावेजों (जैसे इस मामले में फर्जी आधार कार्ड का आरोप है) के सहारे किसी को शादी के जाल में फंसाता है, तो यह एक गैर-जमानती और गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

  • जालसाजी (Forgery): फर्जी सरकारी दस्तावेज (आधार कार्ड) बनाना और उसका इस्तेमाल करना अपने आप में एक अलग और गंभीर आपराधिक कृत्य है, जिसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है।

3. जबरन निकाह, तीन तलाक और कस्टडी का मामला

पीड़िता का आरोप है कि उसकी मर्जी के खिलाफ डरा-धमकाकर उससे निकाह कराया गया और बाद में बच्ची को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर जबरन तलाक के कागजात पर दस्तखत कराए गए।

  • जबरन लिया गया दस्तखत अमान्य: कानूनन, किसी भी व्यक्ति से डर, दबाव या धमकी के प्रभाव में कराए गए हस्ताक्षर या सहमति अदालत में मान्य नहीं होते।

  • बच्ची की कस्टडी: कानून के अनुसार, इतनी छोटी और दुधमुंही बच्ची की कस्टडी का पहला अधिकार उसकी मां का होता है। पिता या उसके रिश्तेदार जबरन बच्चे को मां से अलग नहीं रख सकते। इसके लिए पीड़िता बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee – CWC) की मदद ले सकती है।

4. पीड़िता के पास अब क्या विकल्प हैं?

यदि स्थानीय पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी कर रही है, तो कानून पीड़ित को कई अन्य रास्ते देता है:

  • वरिष्ठ अधिकारियों से गुहार: पीड़िता को जिले के पुलिस अधीक्षक (SP/SSP) को लिखित रूप में अपनी शिकायत सौंपनी चाहिए।

  • मजिस्ट्रेट के माध्यम से (धारा 156(3) / नए कानून के तहत): यदि पुलिस बिल्कुल सहयोग नहीं करती, तो पीड़िता अपने वकील के माध्यम से सीधे कोर्ट (मजिस्ट्रेट) का दरवाजा खटखटा सकती है। कोर्ट के आदेश पर पुलिस को मुकदमा दर्ज करना ही होगा।

  • महिला आयोग का हस्तक्षेप: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) या उत्तर प्रदेश महिला आयोग में इस मामले की शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराई जा सकती है। महिला आयोग अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस को समन जारी कर रिपोर्ट मांगता है, जिससे कार्यवाही में तेजी आती है।

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