इस्लामाबाद । मंगलवार, 30 जून 2026
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से अल्पसंख्यक सिख समुदाय की आस्था को झकझोर देने वाली एक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटना सामने आई है। पंजाब के शेखूपुरा जिले के फारूकाबाद (जिसे ऐतिहासिक रूप से मंडी चूहड़काणा के नाम से जाना जाता है) में स्थित करीब 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री सिंह सभा को स्थानीय भूमाफिया ने प्रशासनिक उदासीनता का फायदा उठाकर मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स और सिख प्रतिनिधियों के मुताबिक, इस कायराना हरकत को मुहर्रम की 8वीं और 9वीं रात यानी 24-25 जून 2026 के बीच अंजाम दिया गया। इस ऐतिहासिक विरासत के ढहाए जाने की खबर सामने आते ही पूरी दुनिया में रहने वाले सिख संगठनों और भारत सहित वैश्विक स्तर पर भारी गुस्सा देखा जा रहा है।
सिखों के बढ़ते आक्रोश के बाद प्रशासन ने उठाया कदम
घटना की भनक लगते ही ननकाना साहिब और स्थानीय सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मौके पर इकट्ठा हो गए। सिख संगत ने कड़ा विरोध जताते हुए तोड़फोड़ और मलबे को हटाने के काम को रुकवाया। सिखों के बढ़ते आक्रोश और वैश्विक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए आखिरकार स्थानीय प्रशासन ने फिलहाल इस ऐतिहासिक जगह को सील कर दिया है और यहां किसी भी तरह के निर्माण या आगे की तोड़फोड़ पर रोक लगा दी है। हालांकि, सिखों का कहना है कि यह कदम तब उठाया गया जब पूरी इमारत को पहले ही जमींदोज किया जा चुका था।
समझिए गुरुद्वारा सिंह सभा का शानदार इतिहास और इसका महत्व
यह गुरुद्वारा साहिब सिर्फ एक इमारत नहीं थी, बल्कि सिख इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण कालखंड की साझी संस्कृति और जागृति का एक अनूठा प्रतीक था:
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सिंह सभा आंदोलन (Singh Sabha Movement) से गहरा कनेक्शन: यह गुरुद्वारा साहिब उन मुख्य केंद्रों में से एक था जहां से सिख धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए ‘सिंह सभा आंदोलन’ को गति मिली थी।
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जत्थेदार करतार सिंह झब्बर का योगदान: साल 1912 में प्रसिद्ध सिख नेता जत्थेदार करतार सिंह झब्बर ने इसी चूहड़काणा (फारूकाबाद) क्षेत्र में ‘खालसा दीवान खरा सौदा बार’ का गठन किया था, जिसने आगे चलकर महंतों के चंगुल से सिख गुरुद्वारों को मुक्त कराने (गुरुद्वारा सुधार आंदोलन) में केंद्रीय भूमिका निभाई।
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शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की नींव: इसी ऐतिहासिक क्षेत्र और आंदोलन के संघर्षों ने आगे चलकर सिखों की सर्वोच्च संस्था SGPC की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया था।
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ऐतिहासिक स्कूल की शुरुआत: साल 1918 में इसी संगठन के अधीन गुरुद्वारा सच्चा सौदा के पास भाई मूल सिंह गुरमुला द्वारा खरीदी गई जमीन पर सिखों की शिक्षा के लिए एक मिडिल स्कूल भी शुरू किया गया था।
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पवित्र गुरुवाणी के शिलालेख: इस प्राचीन गुरुद्वारा साहिब के मुख्य भाग पर गुरमुखी लिपि में गुरु नानक देव जी की महिमा में लिखी प्रसिद्ध पंक्ति “सतगुरु नानक प्रगट्या, मिटी धुंध जग चानण होआ” साफ उकेरी हुई दिखाई देती थी, जिसे भूमाफिया ने मलबे में मिला दिया।
4 साल से रची जा रही थी साजिश, प्रशासन सोता रहा
स्थानीय सिख एक्टिविस्ट्स और जानकारों का कहना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को मिटाने की साजिश पिछले 4-5 साल से लगातार चल रही थी। साल 2026 की शुरुआत में भी एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें दिखाया गया था कि इस पवित्र परिसर के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप से समोसे और मिठाइयां बनाने के लिए किया जा रहा था, जिससे इसकी पवित्रता खंडित हो रही थी।
इसके बाद भूमाफिया ने गुरुद्वारा साहिब के मुख्य ढांचे और गुंबद पर कब्जा करने की नीयत से इसे नुकसान पहुँचाना शुरू किया। ननकाना साहिब के सिख प्रतिनिधि भूपिंदर सिंह ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर बताया कि इस संबंध में पुलिस और प्रशासन को कई बार लिखित शिकायतें की गईं, लेकिन पाकिस्तान के ‘इवैक्युएशन ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड’ (ETPB) और ‘पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ (PSGPC) ने इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
भारत से आए शरणार्थियों को केवल रहने के लिए मिला था ठिकाना
साल 1947 में हुए भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद से ही यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा अल्पसंख्यक सिखों के चले जाने के कारण खाली पड़ा हुआ था। इसके बाद साल 1960 में पाकिस्तान सरकार ने इस खाली पड़ी गुरुद्वारा प्रॉपर्टी को भारत से आए शरणार्थियों (मुहाजिरों) को रहने के उद्देश्य से अलॉट (आवंटित) कर दिया था।
विरासत की देखरेख से जुड़े जानकारों के अनुसार, शरणार्थियों को इसे केवल अस्थायी निवास के लिए दिया गया था। सरकारी नियमों के मुताबिक, इस प्राचीन और ऐतिहासिक ढांचे के मूल स्वरूप में कोई भी बदलाव करने, नया कंस्ट्रक्शन करने या इसे गिराने की सख्त मनाही थी। लेकिन भूमाफिया ने प्रशासनिक सांठगांठ के चलते सारे नियमों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
शाहबाज शरीफ सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग
इस घटना के बाद वैश्विक स्तर पर सिख प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की शाहबाज शरीफ सरकार और पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में पूरी तरह नाकाम रहने का सीधा आरोप लगाया है। सिखों का कहना है कि गुरुद्वारा साहिब जैसी ऐतिहासिक इमारतें पूरी इंसानियत की साझी अमानत होती हैं और इन्हें इस तरह नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
सिख संगत ने मांग की है कि:
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इस साजिश में शामिल भूमाफिया और भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए।
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दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी मामला (FIR) दर्ज कर कार्रवाई की जाए।
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इस ऐतिहासिक स्थल को दोबारा उसके मूल स्वरूप में बहाल करने के लिए सरकारी स्तर पर कदम उठाए जाएं।
फिलहाल वक्फ बोर्ड (ETPB) ने मामले को शांत करने के लिए कानूनी कार्रवाई की बात कही है, लेकिन उचित सुरक्षा और सख्त कदम न उठाए जाने के कारण अल्पसंख्यक सिख समुदाय में अविश्वास और गहरी निराशा का माहौल बरकरार है।
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