
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद का 17वां राष्ट्रीय अधिवेशन प्रारंभ
बालोतरा। अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् का 17वां तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन बालोतरा–नाकोड़ा स्थित लालबाग परिसर में 26 दिसम्बर को प्रारंभ हुआ। अधिवेशन में देश के सभी राज्यों से बड़ी संख्या में अधिवक्ता भाग ले रहे हैं। उच्चतम न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, भारत सरकार के वरिष्ठ विधि अधिकारी तथा कानून जगत की प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित रहीं।
अधिवेशन का उद्घाटन सत्र शुक्रवार को माँ भारती, अधिवक्ता परिषद के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी एवं संविधान निर्माता डॉ. बी. आर. आंबेडकर के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से प्रारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र का केंद्रीय विषय “भारतीय संविधान के 75 वर्ष : सामाजिक समरसता” रहा।
उद्घाटन सत्र में न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “भारत का लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक उसमें लिबर्टी, इक्वालिटी और फ्रैटरनिटी – तीनों एक साथ मौजूद न हों।” उन्होंने कहा कि आंबेडकर के विचारों को आत्मसात करते हुए हम सभी को सामाजिक समरसता के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है। उन्होंने जाति एवं भाषा के आधार पर राष्ट्र की अवधारणा को घातक बताते हुए कहा कि यह विचार कि राजस्थान में केवल राजस्थानी, महाराष्ट्र में केवल मराठी या केरल में केवल मलयाली ही रह सकता है, पूर्णतः गलत है। ऐसी कई साझा समस्याएं हैं, जिनके समाधान के लिए अधिवक्ताओं को सजग रहना चाहिए।
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि बालोतरा की धरती भक्ति की भी है और शक्ति की भी। उन्होंने कवि की पंक्तियां “सोने की धरती जठे, चांदी का आसमान, रंग रंगीलो, रसभरियो मारो प्यारो राजस्थान”, सुनाते हुए राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अब तक 1562 अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त कर चुकी है, जिनकी वर्तमान में कोई आवश्यकता नहीं थी, तथा हाल ही में 71 और अनुपयोगी कानूनों को भी समाप्त किया गया है। उन्होंने आश्वस्त किया कि शीघ्र ही देश में वकीलों के लिए मेडिकल पॉलिसी लाने पर सरकार विचार कर रही है।
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने कहा कि भारत विविधताओं का देश है। केवल राजस्थान को ही देखें तो यहां हर 20 किलोमीटर पर पगड़ी और वेशभूषा बदल जाती है। ऐसे में संविधान निर्माताओं के सामने कितनी बड़ी चुनौतियां रही होंगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सामाजिक समरसता के लिए अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद का मंच अत्यंत महत्वपूर्ण है और अधिवक्ताओं को संविधान का प्रहरी एवं सिपाही बताया।
भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अधिवक्ता परिषद का सम्मेलन शहीदी दिवस के दिन आयोजित किया जाना अत्यंत सराहनीय है। सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं आएगी, बल्कि इसके लिए धरातल पर कार्य करना होगा। यदि हम संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत न्यायालयों से राहत चाहते हैं, तो हमें अपने संवैधानिक कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करना होगा।
कार्यक्रम में परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के. श्रीनिवास मूर्ति ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। परिषद् की गतिविधियों पर महासचिव एवं सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता डी. भरत कुमार ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। जोनल सेक्रेटरी कमल परसवाल, प्रांत सचिव श्याम पालीवाल और स्वागत समिति की ओर से प्रसिद्ध उद्योगपति रमेश मुथा ने विचार व्यक्त किए।
साभार : विश्व संवाद केंद्र
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