ब्रसेल्स. पश्चिम एशिया (West Asia) में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने अब एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है। इस संघर्ष में अब यूरोप के सबसे शक्तिशाली NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) देशों—फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी—की सक्रियता ने दुनिया भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति नहीं संभली, तो यह क्षेत्रीय संघर्ष एक “ग्लोबल वॉर” का रूप ले सकता है।
1. फ्रांस (France): भूमध्य सागर में ‘चेकमेट’ की तैयारी
फ्रांस ने अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करते हुए भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में अपना अत्याधुनिक गाइडेड-मिसाइल युद्धपोत तैनात कर दिया है।
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उद्देश्य: आधिकारिक तौर पर इसे “सुरक्षा और निगरानी” कहा गया है, लेकिन रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह ईरान की ओर से होने वाली किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधि को ट्रैक करने और सहयोगियों को ‘अर्ली वार्निंग’ देने के लिए है।
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प्रभाव: फ्रांस की यह तैनाती लेबनान और सीरिया के तटों के करीब होने के कारण ईरान समर्थित समूहों (हिजबुल्लाह) पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बना रही है।
2. ब्रिटेन (United Kingdom): अमेरिका के लिए खोले सामरिक द्वार
ब्रिटेन ने इस तनाव में सबसे निर्णायक कदम उठाया है। ऋषि सुनक के बाद की वर्तमान सरकार ने भी अपनी नीतियों को कड़ा करते हुए अक्रोतिरी (Cyprus) और डिएगो गार्सिया जैसे सामरिक बेस के उपयोग की अनुमति अमेरिका को दे दी है।
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एयरस्पेस एक्सेस: ब्रिटिश हवाई क्षेत्र का उपयोग करके अमेरिकी बॉम्बर विमान अब कम समय में ईरान के टारगेट तक पहुँच सकते हैं।
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लॉजिस्टिक्स: यह अनुमति NATO बलों की परिचालन क्षमता (Operational Capability) को 40% तक बढ़ा सकती है।
3. जर्मनी (Germany): ‘सॉफ्ट पावर’ से ‘हार्ड पावर’ की ओर
जर्मनी, जो आमतौर पर सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है, अब खुलकर मैदान में आ गया है। जर्मन रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि वे NATO के सामूहिक सुरक्षा ढांचे के तहत रसद (Logistics) और खुफिया जानकारी (Intelligence) साझा करेंगे।
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निगरानी मिशन: जर्मन टोही विमान और सैटेलाइट डेटा अब सीधे खाड़ी क्षेत्र में तैनात मित्र देशों की सेनाओं को उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
क्या NATO सीधे युद्ध में उतरेगा? विशेषज्ञों का विश्लेषण
पूरी दुनिया के मन में एक ही सवाल है—क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत है? विशेषज्ञों का मानना है कि:
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सीधा हस्तक्षेप फिलहाल नहीं: NATO के चार्टर के अनुसार, वे तभी सीधे युद्ध में उतरते हैं जब उनके किसी सदस्य देश पर हमला हो। फिलहाल ईरान के साथ तनाव ‘नॉन-नाटो’ क्षेत्र में है।
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प्रॉक्सी वॉर का खतरा: हालांकि NATO सीधे नहीं कूदेगा, लेकिन इसके सदस्य देश (फ्रांस, ब्रिटेन, इटली) अपनी व्यक्तिगत क्षमता में अमेरिका का साथ दे सकते हैं।
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आर्थिक गलियारा: यदि ईरान ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को बंद करने की कोशिश करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो जाएगी। ऐसी स्थिति में NATO देशों का “पूर्ण सैन्य हस्तक्षेप” अनिवार्य हो जाएगा।
वैश्विक प्रभाव
यूरोपीय देशों की यह सक्रियता केवल इजरायल की सुरक्षा के लिए नहीं है, बल्कि यह रूस और चीन को भी एक कड़ा संदेश है कि पश्चिम एशिया में पश्चिमी देशों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। फिलहाल, कूटनीतिक गलियारों में शांति की अपीलें की जा रही हैं, लेकिन युद्ध के मैदान में बिछी ये मोहरें किसी और ही कहानी की ओर इशारा कर रही हैं।
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